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भावनाओं की भाषा बन चुकी है हिन्दी

भावनाओं की भाषा बन चुकी है हिन्दी

हिन्दी भारत में भावनाओं की भाषा बन कर उभरी है, लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में यह बात सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार हिन्दी की अन्य भाषाओं के शब्दों को लेने की स्वीकार्यता किसी भी प्रचलित भाषा के मुकाबले अधिक है, जबकि पहले यह स्थिति अंग्रेजी की थी।
रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में साठ लाख से अधिक लोग हिन्दी बोलते हैं, जबकि त्रिपुरा में 70 फीसदी आबादी हिन्दी बोलती है। एक बड़ा परिवर्तन दक्षिण भारत के राज्यों में देखने को मिला है जहां की हिन्दी में व्यापक सुधार देखने को मिला है। उनकी हिन्दी में उर्दू का कलेवर देखने को मिला है, जिसने उनकी भाषा में मिठास बढ़ाई है।

रिपोर्ट तैयार करने वाले गणेश सेवी कहते हैं देश में भावनाएं व्यक्त करने के लिए हिन्दी का प्रयोग बढ़ा है पर हिन्दी ज्ञान कमजोर हुआ है। हिन्दी का तकनीकी इस्तेमाल बढ़ाना होगा। हिन्दी के फॉन्ट की संख्या बेहद कम हैं, जबकि अंग्रेजी के फॉन्ट इससे कई गुना ज्यादा हैं।

अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भाषाओं का प्रभाव समान रूप से समाज में दिखाई दे रहा है। साथ ही दोनों भाषाओं को बोलने वाले लोगों का दूसरे लोगों पर बराबर का असर होता है। सेवी कहते हैं कि बदलते दौर में मैथिली और भोजपुरी दोनों क्षेत्रीय भाषाएं तेजी से फैल रही है, जबकि सैकड़ों ऐसी भाषाएं है जो कहीं न कहीं से हिन्दी से जुड़ी है।

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