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माँ - शांति का शिविर

वेद व्यास न कहा था- माता के तुल्य कोई छाया नहीं है, माता के तुल्य सहारा नहीं है। माता के सदृश कोई रक्षक नहीं तथा माता के समान कोई प्रिय वस्तु नहीं है। सन्तति निर्माण में माता की भूमिका पिता से हजार गुणा अधिक है। माता के रूप में नारी अम्बा है, संतान निर्मात्री है, दया है, क्षमा है, कल्याणी है, मां जैसा त्याग ईश्वरीय सत्ता के अतिरिक्त कोई और नहीं कर सकता। मां सर्वव्यापक सत्ता की प्रतिमूर्ति है। इस रूप में स्नेह, वात्सल्य, त्याग, ममता, सेवाभाव अपने चरम पर होते हैं। वह बच्चों पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देती है। उसको पाने में कितनी वेदना, कितनी पीड़ा, कष्ट का सामना करना पड़ता है, पर वह सब प्रसन्नतापूर्वक सहन करती है। उसकी सब पीड़ाएं बच्चे की एक मुस्कान देख शांत हो जाती हैं। आपने देखा होगा दु:ख, कष्टों के क्षण में भी मुख से ‘मां’ शब्द ही निकलता है। धरती जो हमें रहन को स्थान, खान को अन्न, फल आदि सब कुछ देती है, धरती-मां ही कहलाती है। गाय जो हमें अपना दूध पिला कर पालती है, गौ-माता मानी जाती है। मानवता को जन्म देने वाली ‘मातृ-शक्ित’ अदम्य है, असीम है, अगाध है। मां किसी भी दशा में अपनी सन्तान का बुरा नहीं सोचती। उसके आंचल में सन्तान की असह्य पीड़ा समा लेन की शक्ित होती है। मां जैसा वात्सल्य कहां मिलेगा। ‘माता’ शब्द में न जाने ईश्वर न कैसा माधुर्य प्रदान किया है कि जिस शब्द में जा मिलता है, उसी में एक अपूर्ण सरलता, विचित्र माधुर्य तथा हृदयग्राही प्रभाव उत्पन्न कर देता है। इस शब्द का उच्चारण करते ही हृदय आनन्द से गद्गद हो जाता है। माता का आंचल शत-प्रतिशत ‘शान्ति का शिविर’ है। मां का प्रेम नि:स्वार्थ होता है। कवि नीरज ने लिखा है-मां ही गंगा, मां ही जमना, मां ही तीरथ धाम। माता सर पर हाथ जो तेरा, क्या ईश्वर का काम।

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