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थप्पड़ का अर्थशास्त्र

थप्पड़ एक ऐसा अचूक हथियार है जो कभी चूकता नहीं। जिसको मारा जाता है, उसी को लगता है। इसके लिए लाइसेंस नहीं लेना होता। इसमें न गोली लगती है और न ही धार करनी होती है। आप हर स्थान पर इसे लेकर बेखौफ जा सकते हैं। थप्पड़ का समग्र रूप घूंसा कहलाता है, जो थोड़ा-सा इससे भारी होता है। क्योंकि यह कम दायर में अपना प्रभाव दिखाता है। वैसे थप्पड़ को कहीं-कहीं झापड़ और कहीं कंटाप लाफा भी कहते हैं। और जो हालत है कि आने वाले समय में विद्यार्थियों से पूछा जा सकता है कि ‘थप्पड़ मारना विज्ञान है या कला?’ संसद से लेकर सड़क तक थप्पड़ चलता है। मीडिया की कृपा से हरभजन सिंह को सजा मिल गई, वरना प्रतिदिन हाारों थप्पड़बाजी प्रकरण होते हैं और समाप्त हो जाते हैं। जसे अन्धे को अन्ध नहीं कहना चाहिए, वैसे ही हारने वाले को ‘बैड लक’ नहीं कहना चाहिए। तुमने ही हराया और तुम्हीं ने बैडलक कहा। यह चिढ़ाना नहीं है तो और क्या है? अब कह रहे हो कि सांत्वना दी थी। वे तो मेर बड़े भाई हैं। तो क्या बड़े भाई के थप्पड़ मारने पर कोई इस तरह रोता है कि मैदान अगले दिन तक गीला रहता है। सार चैनलों के कैमर तुम्हें दिखा-दिखाकर जुकाम से पीड़ित हो गए? यही थप्पड़ यदि सायमंड के गाल पर पड़ा होता, तो पूरा देश ‘वन्स मोर’ की आवाज लगाता। आज स्थितियां कितनी विपरीत हैं कि पूरा देश एक तरफ और भज्जी बेचार एक तरफ। मैं आपके साथ हूं क्योंकि आपकी भावनाओं को समझता हूं। बार-बार की हार का दर्द क्या होता हे, मुझसे पूछो। रचनाओं के लौटने पर पुत्र जन्म के प्रसंग भी मृत्यु प्रसंग ही लगते हैं। एक तो हार, ऊपर से बैडलक का ‘उपहार’ उपहास नहीं तो और क्या है। कोई उपहास कर और हम चुप रहें। यह संस्कृति और सयता दोनों के खिलाफ है। अन्याय करने वाले से अधिक दोषी होता है अन्याय सहने वाला। भज्जी! तुम महान हो। पैसा हाथ का मैल होता है, अच्छा ही हुआ कि तुमने मैल (4 करोड़) को झटक दिया। अब साफ होने के साथ ही शुद्ध भी हो गए हो। ‘खेल में सब चलता है’ के तहत थप्पड़ को नजरअंदाज किया जा सकता था। सीनियर खिलाड़ी के मान-सम्मान की रक्षा हेतु नियमों में शिथिलता बरतनी चाहिए थी। परंतु अड़ियल (बोर्ड और अम्पायर) लोग अपनी अकड़ के चलते एक ‘सय-सज्जन’ खिलाड़ी को सजा दे ही दी। अब विज्ञापन वाले भी ‘बेचार’ को दूर से ही सलाम ठोकेंगे। जय क्रिकेट, जय थप्पड़।

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  • Web Title: थप्पड़ का अर्थशास्त्र