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पद और गरिमा

आप चाहें तो इसे एक मिसाल भी कह सकते हैं। भीषण गर्मी के दिन और विशाल राजभवन में रहने वाला एक राज्यपाल हर रो दो घंटे के लिए अपने महलनुमा घर के सारी बत्तियां, सार पंखे, सार एयर कंडिशनर बंद करवा देता है। सिर्फ इसलिए कि उसके प्रदेश की एक आबादी बिना बिजली के रहने को मजबूर है। आप कहेंगे कि समर्पण की ऐसी मिसाल आज की राजनीति में मिलती भी कहां है। वैसे भी राज्यपाल का पद तो लोग राजनीति से रिटायर होने के बाद आराम की जिंदगी जीने के लिए स्वीकार करते हैं। ऐसे रिटायरमेंट प्लान में भला आम जनता के दुखों का अहसास कौन करना चाहेगा? पूरा प्रकरण शहरी मध्यवर्ग को खासा अपील करने वाला है। राज्यों में बिजली की आपूर्ति की जो हालत है उसमें कोई तो है जिसने दिखावे के लिए ही, कुछ किया तो। लेकिन पश्चिम बंगाल के राजभवन में राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी ब्लैक आउट के साथ जो प्रयोग कर रहे हैं उसमें सत्य के आग्रह कम और विघ्नकारक पंरपराओं के संकेत ज्यादा दिखते हैं। प्रदेश में बिजली का मुद्दा कई दिन से गर्म है। बिजली की कमी नहीं है समस्या प्रबंधन की है, जिसे लेकर सरकार की खासी खिंचाई भी चल रही है। ऐसे में जब राजभवन की बत्तियां गुल होती हैं तो नागरिकों को बचत की प्रेरणा की लहरं नहीं, बल्कि सरकार को खराब प्रबंधन के लिए चिढ़ाने वाला स्वर ही अधिक निकलता है। उसी सरकार को चिढ़ाने का जिसके कि राज्यपाल खुद संवैधानिक प्रमुख हैं। यानी यह गांधीगिरी कुछ ऐसी ही है जसे कोई राजा खुद अपनी ही सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करे। इसके तुरंत बाद ही प्रदेश के विपक्ष की प्रमुख नेता ममता बनर्जी ने जिस तरह से इस मुद्दे को लपका है, उसे देखते हुए मान्यराज्यपाल को इस पहल के खतर तथा अपनी लक्ष्मण रखा समझ लेनी चाहिए। राज्यपाल जनता की समस्याओं को सामने लाएं यह तो ठीक हो सकता है लेकिन जाने -अनजाने विपक्ष को राजनीति के मुद्दे पकड़ाएं यह इस पद की गरिमा के अनुकूल नहीं। राज्यपाल जो कर रहे हैं, उसका स्वर लोकलुभावन है, लेकिन राज्यपाल का पद लोकलुभावन राजनीति के लिए तो नहीं होता।

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  • Web Title: पद और गरिमा