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दस मई का शुभ दिन

दस मई वह शुभ दिन है जिस दिन कि ‘आजादी की जंग’ शुरू हुई थी। भारतवासियों का गुलामी की जंजीरं तोड़ने के लिए यह प्रथम प्रयास था। यह प्रयास भारत के दुर्भाग्य से सफल नहीं हुआ, इसीलिए हमार दुश्मन इस ‘आजादी की जंग’ को ‘गदर’ और बगावत के नाम से याद करते हैं और इस ‘आजादी की जंग’ में लड़ने वाले नायकों को कई तरह की गालियाँ देते हैं। विश्व के इतिहास में ऐसी कई घटनाएँ मिलती हैं, जहाँ आजादी की जंग को कई बुर शब्दों में याद किया जाता है। कारण यही है कि वह जंग जीती न जा सकी। यदि विजय हासिल होती तो उन जंगों के नायकों को बुरा-भला न कहा जाता, बल्कि वे विश्व के महापुरुषों में माने जाते और संसार उनकी पूजा करता। आज दुनिया गैरीबाल्डी और वाशिंगटन की क्यों बढ़ाई व इज्जत करती है, इसलिए कि उन्होंने आजादी की जंग लड़ी और उसमें सफल हुए। यदि वे सफल न होते तो वे भी ‘बागी’ और ‘गदरी’ आदि भद्दे शब्दों में याद किए जाते। लेकिन वे सफल हुए, इसलिए वे महापुरुषों में माने जाने लगे। इसी तात्या टोपे, नाना साहिब, झाँसी की महारानी, कुमार सिंह, और मौलवी अहमद साहिब वीर जीत हासिल कर लेते तो आज हिन्दुस्तान की आजादी के देवता माने जाते और सार हिन्दुस्तान में उनके सम्मान में राष्ट्रीय त्योहार मनाया जाता। हिन्दुस्तान के मौजूदा इतिहास को, जो कि हमार हाथों में दिए जाता है, पढ़कर हिन्दुस्तानियों के दिलों में उन शूरवीरों के लिए कोई अच्छी भावनाएं पैदा नहीं होतीं, क्योंकि उन ‘आजादी की जंग’ के नायकों को कातिल, डाकू, खूनी, धार्मिक जनूनी व अन्य कई बुर-बुर शब्दों में याद किया गया है और उनके विरोधियों को राष्ट्रीय नायक बनाया गया है। कारण यह है कि 1857 की ‘आजादी की जंग’ के जितने इतिहास लिखे गए हैं, वे सार के सार ही या तो अंग्रेजों ने लिखे हैं या अंग्रेजों के चाटुकारों ने। जहाँ तक हमें पता है। इस आजादी की जंग का एकमात्र स्वतंत्र इतिहास लिख गया, जो कि बेरिस्टर सावरकर ने लिखा था और जिसका नाम ‘1857 की आजादी की जंग का इतिहास’ था। यह इतिहास बड़े परिश्रम से लिखा गया था और इण्डिया ऑफिस की लाइब्रेरी से छान-बीन कर, कई उद्धरण दे-देकर सिद्ध किया गया था कि यह राष्ट्रीय संग्राम था और अंग्रेजों के राज से आजाद होने के लिए लड़ा गया था। लेकिन अत्याचारी सरकार ने इसे छपने ही नहीं दिया और अग्रिम रूप से जब्त कर लिया। इस तरह लोग सच्चे हालात पढ़ने से वंचित रह गए। इस जंग की असफलता के बाद जो जुल्म और अत्याचार निर्दोष हिन्दुस्तानियों पर किया गया, उसे लिखने की न तो हमार में हिम्मत है और न ही किसी और में। यह सब कुछ हिन्दुस्तान के आजाद होने पर ही लिखा जाएगा। हाँ, यदि किसी को इस जुल्म, अत्याचार और अन्याय का थोड़ा-सा नमूना देखना हो तो उन्हें एडवर्ड थामसन की पुस्तक, ‘तस्वीर का दूसरा पहलू’ पढ़नी चाहिए, जिसमें उसने सय अंग्रेजों की करतूतों को उघाड़ा है और जिसमें बताया गया है कि किस तरह नील हेवलाक, हडसन कूपर और लारन्स ने निर्दोष हिन्दुस्तानी स्त्री-बच्चों तक पर ऐसे-ऐसे कहर ढाए थे कि सुनकर रोएं खड़े हो जाते हैं और शरीर काँपने लगता है! लेकिन इस बात का खयाल करके स्वतंत्र व्यक्ितयों को शर्म आएगी कि वे लोग भी, जिनके बुजुर्ग इस जंग में लड़े थे, जिन्होंने हिदुस्तान की आजादी की बाजी पर सब कुछ लगा दिया था और जिन्हें इस पर गर्व होना चाहिए था, वे भी, इस जंग को आजादी की जंग कहने से डरते हैं। कारण यह कि अंग्रेजी अत्याचार ने उन्हें इस कदर दबा दिया था कि वे सर छुपाकर ही दिन काटते थे। इसलिए उन बुजुर्गो की यादगार मनानी या स्थापित करनी तो दूर, उनका नाम लेना भी गुनाह समझा जाता था। लेकिन हालात कुछ ऐसे बन गए कि जिनसे विदेशों में बसे हिन्दुस्तानी नौजवान 10 मई के दिन को राष्ट्रीय त्योहार बनाकर मनाने लगे। और कुछ हिन्दी (हिन्दुस्तानी) नौजवान यहाँ भारत में भी यही त्योहार मनाने की कुछ कोशिशें करते रहे हैं। सबसे पहले यह त्योहार इंग्लैण्ड में ‘अभिनव भारत’ ने बैरिस्टर सावरकर के नेतृत्व में सन 107 में मनाया। गुलामों में खुद तो ऐसे यादगारी-दिन मनाने के ख्याल कम ही पैदा होते हैं। 107 में अंग्रेजों ने विचार किया कि 1857 के गदरियों पर जीत हासिल करने की पचासवीं वर्षगाँठ मनानी चाहिए। 1857 की याद ताजा करने के लिए हिन्दुस्तान और इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध अंग्रेजों के अखबारों ने अपने-अपने विशेषांक निकाले, ड्रामे किए गए और लैक्चर दिए गए और हर तरह से इन कथित गदरियों को बुरी तरह कोसा गया। यहाँ तक कि जो कुछ भी इनके मन में आया, सब ऊल-ालूल इन्होंने गदरियों के खिलाफ कहा। इन गालियों और बदनाम करने वाली कार्रवाई के विपरीत सावरकर ने 1857 के हिन्दुस्तानी नेताओं- नाना साहिब, महारानी झाँसी, ताँत्या टोपे, कुँवर सिंह, मौलवी अहमद साहिब की याद मनाने के लिए काम शुरू कर दिया, ताकि राष्ट्रीय जंग के सच्चे-सच्चे हालात बताए जाएं। यह बड़ी बहादुरी का काम था और शुरू भी अंग्रेजी राजधानी में किया गया। छोटे-छोटे पैम्फलेट ‘ओह शहीदों’ के नाम से इंग्लैण्ड और हिन्दुस्तान में बाँटे गए। छात्रों ने आक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज और उच्चकोटि के कॉलेजों में छातियों पर बड़े-बड़े, सुन्दर-सुन्दर बैज लगाए जिन पर लिखा था, ‘1857 के शहीदों की इज्जत के लिए।’ गलियों-बाजारों में कई जगह झगड़े हो गए। एक कॉलेज में एक प्रोफेसर आपे से बाहर हो गया और हिन्दुस्तानी विद्यार्थियों ने माँग की कि वह माफी माँगे, क्योंकि उसने उन विद्यार्थियों के राष्ट्रीय नेताओं का अपमान किया है और विरोध में सार के सार विद्यार्थी कॉलेज से निकल आए। कई की छात्रवृत्तियाँ मारी गईं, कइयों ने इन्हें खुद ही छोड़ दिया। कइयों को उनके माँ-बाप ने बुलवा लिया। इन हालात की खबर जहाँ भी पहुँची, विदेशों में, वहाँ-वहाँ दस मई का दिन बउ़ी सज-धज से मनाया गया और लोगों में बड़ा जोश आ गया कि अंग्रेज किस प्रकार हमार राष्ट्रीय वीरों को बदनाम करते हैं। उन्होंने रोष के रूप में बैठकें कीं और उनकी याद में 10 मई का दिन हर वर्ष मनाना शुरू कर दिया। काफी समय बाद अभिनव भारत सोसायटी टूट गई और इंग्लैण्ड में यह दिन मनाना बन्द हो गया, लेकिन कुछ समय बाद अमेरिका में हिन्दुस्तान गदर पार्टी स्थापित हो गई और उसने उसे हर बरस मनाना शुरू कर दिया। यह लेख 1में किरती नाम की पत्रिका में बिना लेखक के नाम से छपा था। भगत सिंह इस पत्रिका के संपादकीय विभाग में काम कर रहे थे इसीलिए माना जाता है कि यह उन्हीं का लिखा लेख है। हालांकि कुछ लोग इसे उनके सहयोगी भगवतीचरण वोहरा का लेख भी मानते हैं।ं

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