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कामयाबी क्यों सिर पर चढ़ कर नाचती है

उन्होंने खुद उसके बार में कभी सोचा तक न हो। अपने क्रिकेटर हरभजन सिंह और श्रीसंत इसकी बेहतरीन मिसाल हैं। हरभजन या प्यार से भज्जी निचले मध्यम वर्ग से आते हैं। आम हालात में इस तरह के लोग कॉलेज से निकलने के बाद किसी तरह कोई मामूली सी सरकारी या प्राइवेट नौकरी पा लेते हैं। अब क्रिकेटर होने की वजह से उन्हें वहां की दिक्कतों से कोई लेना-देना नहीं है। वे तो टीम इंडिया का हिस्सा हैं। उनके सेलिब्रिटी होने की दास्तां कमाल की है। जब भज्जी पहली बार हिंदुस्तानी टीम में आए थे, तो बमुश्किल अंग्रेजी बोल पाते थे। लोगों को मजा आता था कि वह विदेशी जुबान में किस कदर लडख़ड़ा रहे हैं। अपनी बॉलिंग की वजह से ये सेलिब्रिटी स्टेटस मानसून की बौछार की तरह आया। भज्जी देखते ही देखते करोड़पति हो गए। चंडीगढ़ में अपना बंगला खरीद लिया। और न जाने क्या-क्या? इस सबके उन्होंने सपने भी नहीं देखे थे। फिर उन्हें गजब की मीडिया कवरा मिली। मानो वह कोई फिल्म स्टार हों। उनका आत्मविश्वास बढ़ने लगा। वह बदलकर बदतमीजी तक चला आया। मुझे पूरा भरोसा है कि ऑस्ट्रेलियन के साथ जो भी ‘तू-तू मैं-मैं’ हुई थी। उसकी शुरुआत उन्होंने ही की होगी। उन्होंने सचमुच बेहूदा पंजाबी गाली ‘मां की’ दी होगी। ऑस्ट्रेलियन ने उसे मंकी या बंदर समझ लिया होगा। मैं श्रीसंत के बार में नहीं जानता। वह किस माहौल से आते हैं मुझे नही पता। लेकिन वो भज्जी से कम तेजी से सेलिब्रिटी नहीं हुए। वह भी बॉलर हैं। हो सकता है उन्हें आपस में कोई दिक्कत हो। इसी चक्कर में उन्होंने क्रिकेट की शक्ल ही बदल दी। उस क्रिकेट की जिसे जेंटलमेन गेम कहा जाता है। उन्होंने उसे सड़क छाप बना डाला। दोनों की ठुकाई की गई। दोनों उसके हकदार थे। बिंबो अगर मेरी याददाश्त ठीक है, तो बिंबो का इस्तेमाल एक बार रेणुका चौधरी ने किया था। वह केंद्रीय मंत्री हैं और बिंबो उन्होंने एक विपक्षी महिला के लिए कहा था। तब सदन में खूब हंगामा हुआ था। सभी सांसद सोच रहे थे कि यह कोई खराब शब्द है। वे सोच रहे थे कि शायद इसका मतलब बिना दिमाग की खूबसूरत औरत से है। मुझे नहीं मालूम की उस सबका क्या हुआ? उसे असंसदीय माना गया या नहीं। मैं रणुका को तब से जानता हूं जब वह हैदराबाद से पहली बार चुन कर आई थीं। मेरा मानना है कि बहस में वह किसी को भी हरा सकती हैं। वह चाहे आदमी हो या औरत। वह बेहद तेजतर्रार और मजाकिया हैं। मुझे उन्हें देख कर बिहार की तारकेश्वरी सिन्हा याद आती हैं। वह मोराराी मंत्रिमंडल में थीं। खूबसूरत होने के साथ-साथ उन्हें खूब शेर ओ शायरी आती थी। तारकेश्वरी की ही तरह रणुका भी कमाल की कंपनी देती हैं। िबबो पर वापस आता हूं। मेरा मानना है कि वह इतालवी बैंबिनो से लिया गया है। उसका मायने बेबी जसा कुछ होता है। अब अपनी गर्ल फ्रेंड को बेबी कहना कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन यह मानना कि उसका ऊपरी तल्ला गायब है, यह ठीक नहीं है। मुझे लगता है कि अगर औरत को खूबसूरती और दिमाग में फैसला करना पड़े, तो दस में से नौ खूबसूरती को ही तराीह देंगी। वे स्कूली बहनजी कभी नहीं होना चाहेंगी। मैं आपको एक बात और बताऊं। पहले तो यह बिंबो सिर्फ औरतों के लिए इस्तेमाल होता था। अब तो उसे आदमियों पर भी इस्तेमाल करने लगे हैं। कोसम या कदम मेरे कदंब के पेड़ पर एक पाठक ने मुझे फोन किया। अगले दिन वह आ भी गए। उनका कहना था कि वह पेड़ कदंब का नहीं है। वह प्रदीप कृष्ण की ‘ट्रीा ऑफ डेल्ही’ ले कर आए थे। वह किताब अपने आपमें क्लॉसिक है। वह सचमुच ठीक थे। दरअसल, कदंब के चक्कर में मैंने कोसम लगा दिया था। उसे कुसुम भी कहा जाता है। इस पेड़ को शहर में कई जगह देखा जा सकता है। उसकी लकड़ी ठोस होती है। उसका फल और फूल दवाइयों के काम आता है। मैं सचमुच नहीं जानता था। मैं उसके नाम की वजह से आदिम प्रजाति का समझता था। लेकिन वह मादा प्रजाति का निकला। फिर क्या खूबसूरत नाम है कुसुम! ओ मेरी कुसुमरानी तुम खूब फलो-फूलो। और सौ कोसम को जन्म दो!

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