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पाप तो किया है, पर

दिल्ली के लोदी रोड का एक इलाका मुझे बेहद पसंद है। वहां लाइन से मंदिर हैं। मेरा फेवरिट है राम मंदिर। वह मंदिर रामानुज संप्रदाय का है। लेकिन वहां तुलसीदास की रामचरितमानस का सुंदरकांड दीवारों पर अंकित है। उत्तर भारत में दक्षिण भारतीयों का मंदिर, उसमें तुलसीदास का सुंदरकांड। लोहिया जी कहते थे कि दक्षिण और उत्तर की एकता कराते हैं राम। रामानुजाचार्य विशिष्टाद्वैत के आचार्य हैं। आदि शंकराचार्य के अद्वैत से असहमति जताते हुए जो चार आचार्य मशहूर हुए उनमें रामानुज सबसे पहले हैं। उनके साथ ढेरों कथाएं जुड़ी हुई हैं। एक कथा मुझे अपील करती रही है। रामानुज श्रीरंगम आ गए थे। आचार्य गोष्ठीपूर्ण से उन्हें ज्ञान लेना था। उन्नीस बार लौटाने के बाद उन्होंने रामानुज को ज्ञान देने का मन बनाया। परम सत्य को पाने के लिए उन्होंने तमाम ज्ञान के अलावा ‘ॐ नमो नारायण:’ का मंत्र दिया। साथ ही यह भी प्रतिज्ञा करा ली कि उस ज्ञान या मंत्र को वह किसी को न दें। रामानुज वहां से लौटने के बाद उलझन में रहे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि उस ज्ञान और महान मंत्र को अपने तक सीमित कैसे रखें? क्यों रखें? उसे जन-ान तक क्यों न पहुंचाएं? वह रात भर परशान रहे। अगले दिन उन्होंने वहां मौजूद सब लोगों को मंदिर में इकट्ठा होने के लिए कहा। वह मंदिर के गोपुरम पर चढ़ गए और चिल्ला-चिल्ला कर उस मंत्र को जन-ान के हवाले कर दिया। आचार्य गोष्ठीपूर्ण जबर्दस्त नाराज हुए। वह रामानुज को भला-बुरा कहने लगे। रामानुज ने उनसे माफी मांगते हुए कहा, ‘महाराज मैंने सचमुच पाप किया है। मैंने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ी है। लेकिन अगर एक पाप करने से तमाम लोगों को मुक्ति मिल सकती है, तो उसका प्रायश्चित करने को मैं तैयार हूं।’ गोष्ठीपूर्ण लाजवाब हो गए और उन्हें माफ कर दिया। रामानुज सिर्फ अपने लिए ही परम सत्य नहीं पाना चाहते थे। वह तो अपने साथ तमाम लोगों की मुक्ति चाहते थे। वह निज को जन में मिला देना चाहते थे। आचार्य रामानुज की जयंती पर नमन।

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