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राजरंग

बड़ी मुश्किल बाबा बड़ी मुश्किल..ड्ढr दिल्ली वाले प्रदेश प्रभारी साहब अब एकदम से साइलेंट हो गये हैं। बहुत कोशिश किये कि सूबे का नाम पूरी दुनिया में चमके। विकास हो। जनता के चेहर पर मुस्कान आये। सरकार सही दिशा में काम कर और न जाने क्या.. क्या? लेकिन कुछ नहीं हुआ। होगा भी कैसे? आज तक झारखंडी राजनीति को कोई नहीं पहचान पाया है। जो भी इस झमेले में पड़ा वह साइलेंट हो गया। इससे पहले कमान एक मैडम के पास थी। पर वह भी कुछ नहीं कर पायीं। प्रभारी साहब का पहला अस्त्र अल्टीमेटम था। वह मटियामेटम हो गया। इसके बाद प्रभारी साहब यहां क्लासो लिये। अपना स्टूडेंट लोग को पढ़ाये भी, लेकिन कुछ नय हुआ। उनका कहना था कि सरकार बदली है, तो काम करने का अंदाज भी बदलना चाहिए। आइडिया अच्छा था, लेकिन दिल्ली वाला सोच यहां चल नहीं पाया। अब तो पार्टी के कार्यकर्ता भी साइलेंट हो गये हैं। विकास, महंगाई, भ्रष्टाचार और भयमुक्त सूबा बनाने का ख्वाब भी अधूरा ही रह गया है। कोई जुलूस जलसा भी नहीं हो रहा। अब तो प्रभारी साहब भी समझ गये हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। इसीलिए तो सोते-ाागते यही गुनगुना रहे हैं बड़ी मुश्किल बाबा बड़ी मुश्किल..।

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