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रामदास, रामसेतु और राजहठ

यूँ तो बुद्धिाीवियों तथा मीडिया के साथ इंदिरा गाँधी और उनके बाद के सभी नेताओं के रिश्ते बहुत सुखद नहीं रहे, पर क्या आपको याद आता है, कि उनके पारित किए किसी संशोधन या सार्वजनिक योजना के न्यायालय द्वारा स्थगितरद्द किए जाने पर आतिशबाजियाँ छोड़ी गई हों? नेताओं का गैरलोकतांत्रिक राजहठ छुड़वाने को यह जरूरी था कि डॉक्टर वेणुगोपाल की बहाली, बी. आर. टी. एस. योजना तथा हुसेन के खिलाफ दायर अश्लीलता के दावों के बहाने न्यायपालिका स्वायत्तता, संचरण क्षमता और अभिव्यक्ति की आजादी के सवालों पर चिंतित देश की जनता (वह मीडिया के भीतर हो या बाहर, उत्तरी भारत की हो या दक्षिणी भारत की, दक्षिणपंथी रुझानों वाली हो या वामपंथी) के पक्ष में एकाधिक तर्कसंगत, सुविचारित और आग पर पानी डालने वाले फैसले देती। यह पुण्यकर्म उसने किया और इसके लिए हम उसके आभारी हैं। दिल्ली की सत्ता परिधि के भीतर शायद कुछ ऐसे एंटी विक्रमादित्य सिंहासन मौजूद हैं जिन पर बैठ कर बुद्धिमान और पढ़े-लिखे नेता भी राजहठ के शिकार होकर लोकतंत्र पर कुल्हाड़े चलाने लगते हैं। अजरुनसिंह हों या मु.म.जोशी, रामदास हों या कि बी. शंकरानन्द, शीला हों या खुराना, सबने जिद में जनता और अपनी पार्टी को जबर्दस्त चोटें पहुंचाई हैं। राजहठ पाले हुए वर्तमान सरकार ने दिल्ली में बी. आर. टी. एस. कॉरीडोर बनाने से लेकर एम्स-निदेशक की बर्खास्तगी को (मूक) तथा सेतुसमुद्रम् परियोजना को (मुखर) समर्थन देने तक बेवजह भिड़ों के छत्ते में हाथ डाला है। और जब मधुमक्िखयों ने हमला बोल दिया, तो कभी सरकार झाड़ियों में छिपी, कभी परदा डालने में जुटी, कभी नकाब पहन कर हण्टरवाली बनी और कभी मंत्रिमण्डल की गुप्त बैठकों में बैठकर उसने बाहर ताले डलवा दिए। और चूंकि माननीय स्वास्थ्यमंत्री से लेकर तेलमंत्री तक के सार अधीनस्थ मंत्री और अफसर अपने बॉस की अफलातूनी योजनाओं के अनुपालन में व्यस्त रहे, इसलिए उनकी भी शैली यही बन गई कि सरकारी काम अच्छा हो, या घातक, उसे येन-केन जारी रखा जाए फिर चाहे आँकड़ों की लीपापोती में हाथ की सफाई दिखानी पड़े, पालतू विशेषज्ञों की फौा से ‘अश्वत्थामा हत:’ कहलाना पड़े या मीडिया के किसी पीछे के दरवाजे से अपने समर्थन में झूठी खबरं प्लाण्ट करा दी जाएं। सच तो यह है, कि उच्चशिक्षा में फीस में क्षाफा या प्रबंधन की कक्षाओं में पिछड़ा आरक्षण पर मान्य मंत्रियों के व्यक्तिगत विचार चाहे जो रहे हों, देश के शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्रों की असली समस्याओं से वे कतई उदासीन दिखते हैं। मसलन अभी (‘सेव दि चिल्ड्रन’ नामक स्वैच्छिक संगठन की) एक ताजा रपट ने 55 देशों में बच्चों के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य कल्याण को लेकर हिंदुस्तान का स्थान 27वीं पायदान पर (ाहॉं घाना और एरिट्रिया जसे देश खड़े हैं) ठहराया है। क्योंकि भारत अपने सिर्फ 31 प्रतिशत बच्चों को ही स्वास्थ्य सुविधाएँ दे रहा है। देश में एक बरस का होने से पूर्व जो 10 लाख बच्चे मर रहे हैं उसे और भयावह रूप से ऊँची मातृ-मृत्युदर तथा पोलियो की रोकथाम को हमारा स्वास्थ्य मंत्रालय क्या कर रहा है? दूर-दराज के गाँव तो छोड़िए राजधानी क्षेत्र में ही हाल में एकाधिक घटनाओं में डॉक्टरों की कमी या उनकी लापरवाही के चलते अस्पतालों से हँकाली गई लाचार गर्भवती स्त्रियों ने सड़क पर ही बच्चे जने और फिर जच्चा-बच्चा दोनों की मृत्यु हो गई। डॉक्टरों-नर्सो का पलायन सरकारी क्षेत्र से ऐसा जारी है कि हर रो मरीाों के खिजलाए परिान स्टाफ को पीट या उनसे पिट रहे हैं। दिल्ली के नए आपात्कालीन ट्रामा सेंटर में यह हाल है कि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी घावों में टॉंके लगा, और टूटी हड्डियों पर पलस्तर चढ़ा रहे हैं। पर लगता है स्वास्थ्य मंत्री की दृष्टि में यह सब उतना असह्य नहीं जितना यह, कि शाहरुख खान और अमिताभ बच्चन जसे स्टार फिल्मों में शराब-सिगरट पीकर खुल्लमखुल्ला देश की नई पीढ़ी को बिगाड़ रहे हैं, और एम्स के निदेशक उनकी खुली हुक्म-उदूली के बाद भी कुर्सी पर बैठे हुए हैं। ऐसी ही जिद्दी सनक दिल्ली के कुख्यात बी. आर. टी. एस. कॉरीडोर और सेतु समुद्रम् परियोजना को लेकर भी हावी है। पर सरकार की ऊटपटांग हरकतों और विरोधाभासी बयानों पर मीडिया जब जनहित में टिप्पणी कर तो उसे अक्सर विघ्नसंतोषी और शैतान करार दे दिया जाता है। जब आज से चारक साल पूर्व संप्रग ने राजकाज सॅंभाला था, तो राजग से आािज जनता को उम्मीद थी, कि वामदलों तथा सपा के समर्थन से बनी यह सरकार भारतीय गठाोड़-राजनीति को कुबड़ेपन से मुक्त करके सीधे चलना सिखा देगी। तब अर्थनीति से लेकर विदेश नीति तक राजकाज को और अधिक खुला और पारदर्शी बनाने की कई बातें कही भी गई थीं। लेकिन आज जब सरकार कोर्ट के आदेश की तहत भारतीय पुरातत्व विभाग को रामसेतु की पड़ताल के बाद विवेचना प्रस्तुत करने का आदेश देती है तो भी लोग बहुत आश्वस्त महसूस नहीं करते क्योंकि आखिर यह तो वही सरकारी विभाग है, जिसके बनाए मूल सरकारी प्रतिवेदन में राम के बार में दी टिप्पणी ने एक ऐसा बवंडर उठा दिया था, कि सरकार को दूसरा प्रतिवेदन दाखिल करना पड़ा।ड्ढr ऐसा नहीं है कि देश की सौ फीसदी जनता पूरी न्यायपालिका को फरिश्तों का समूह मानती हो, और उसे अदालती प्रक्रिया से कोई शिकायतें न हों। लेकिन फिर भी न्यायपालिका द्वारा एम्स मामले में विधायिका का फैसला निरस्त किए जाने पर यदि नागरिकों का कोई समूह विधायिका के पक्ष में मुखर नहीं हो रहा है तो इसकी वजह यह आम धारणा है, कि स्वास्थ्य मंत्रालय या शिक्षा जसे मंत्रालयों को आम आदमी के सच्चे कष्टों की बजाय सिर्फ इसी बात से मतलब है कि कोई न जान सके कि देश के 6प्रतिशत बच्चों को सरकारी स्वास्थ्यतंत्र कोई सुविधाएँ क्यों नहीं दे पा रहा, कि तमाम जननी-शिशु योजनाओं के बाद भी न मातृमृत्युदर घट रही है, और न ही शिशुमृत्युदर, और सर्वशिक्षा अभियान के बावजूद आज भी दुनिया में निरक्षरों की सबसे बड़ी फौा हमार यहाँ ही मौजूद है। सेंसर बोर्ड अध्यक्षा शर्मिला टैगोर ने एकाधिक बार फिल्मों के नैतिक स्खलन पर मान्य स्वास्थ्यमंत्री द्वारा गर्जना किए जाने पर ठीक ही कहा कि बेहतर हो, वे पहले अपने अधीनस्थ विभागीय नेताओं-बाबुओं के सिगरट और शराब सेवन पर तसल्लीबख्श तरीके से रोक लगा कर तो दिखाएँ।ड्ढr न्यायपालिका या मीडिया में भले हाार खामियाँ हों, लेकिन आज जब एंटी-विक्रमादित्य सिंहासन पर आरूढ़ नेताओं की आत्मघाती जिद के आगे विधायिका और कार्यपालिका हथियार डालते दिखते हैं, तो मीडिया और ऊँ ची अदालतों में ही लोगों को ऐसे मंच नजर आते हैं, जहाँ संविधान की मर्यादाओं और करोड़ों भारतीयों की अंतरात्मा में बैठी लोकतांत्रिकता को आज भी सीधे संबोधित करने वाले बक्तव्य तथा फैसले निकल सकते हैं। लिहा लोकतांत्रिक भारत की जान आज इन्हीं दो तोतों की देह में आकर बस गई है। लोकतंत्र के शेष दो पायों से जनता का भरोसा उठना यूँ बहुत अच्छा नहीं है (और मीडिया तो पंचम (नाट्य) वेद की तरह बाद को चौथा पाया घोषित हुआ है), लेकिन फिलहाल तो यह ध्रुवीकरण ही हमार वक्त की सचाई है। और इसलिए मीडिया और न्यायपालिका पर आज पहले से कहीं अधिक प्रौढ़ और जिम्मेदार बनने का दबाव बढ़ रहा है।ं

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