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खबरों को जरूरत है खली की

इन दिनों ‘द ग्रेट खली’ हिंदी समाचार चैनलों का नया शगल है- एक ऐसा देसी नायक जिसके सहार वे आईपीएल के जादू को काटने में लगे हुए हैं। यह कह देना बहुत आसान है कि खली नाम का तमाशा भारतीय मीडिया के उसी मानसिक दीवालिएपन का नया सबूत है जिसके प्रमाण वह इसके पहले भी जब-तब सुलभ कराता रहा है- कभी उसकी कार बिना ड्राइवर के दौड़ती है, कभी उसे कोई ऐसा बूढ़ा मिल जाता है जो अपने मरने की तारीख बताता है और मीडिया को इस रोचक अंत का गवाह बनने के लिए अपने साथ बिठाए रहता है, कभी वहां मटुकनाथ और जूली का प्रेम खिलता है, कभी राखी सावंत का गुस्सा और कभी राजू श्रीवास्तव की हंसी। खली इन्हीं कहानियों के बीच का एक और अफसाना है। लेकिन खली बनता कैसे है? उसे बनाता कौन है? पहले यहां से शुरू करं कि खली के साथ खेलने की मुश्किलें और आसानियां क्या-क्या हैं? मुश्किल सिर्फ खली के लगातार समाचार चैनलों पर बने रहने का औचित्य खोजना है। डब्लूडब्लूई नाम के एक संदिग्ध आयोजन का ऐसा पहलवान, जो एक रिंग में पिटने-पीटने के तमाशे में लगा रहा है, इतना बड़ा क्यों है कि उस पर टीवी चैनल इतने घंटे बरबाद करं? एक आसान जवाब खली की लोकप्रियता है। प्रियंका गांधी से लेकर सचिन तेंदुलकर तक के बच्चे उससे मिलने को बेताब हैं, प्रतिभा पाटील भी उसे समय देती हैं और अमिताभ बच्चन भी। चैनल लगातार यह बात दुहराते हैं और खली को दिखाने का औचित्य साबित करते हैं। दूसरी बात यह कि खली टीवी चैनलों और दर्शकों को भी कई दुविधाओं से मुक्त करता है। छोटे परदे पर सेक्स, हिंसा और जुर्म की जो बाढ़ सबको परशान करती है, वह खली में नहीं है। चैनल एक भोले-भाले भारतीय नायक के तौर पर उसको स्थापित करने में जुटे हैं- उसका दिमाग छोटे बच्चे जसा है, कुश्ती में उसके साथी पहलवानों ने उसे धोखे से हराया है, वह परमात्मा से डरता है, उसका दिल बेहद कोमल है, वह भ्रष्टाचार दूर करना चाहता है और उसका एक मुक्का सौ किलो के बराबर है। ध्यान से देखें तो टीवी चैनलों और दोयम दज्रे के कॉमिक्स की मारी हुई बात कल्पनाशीलता में खली को अपना साबू दिखता है, अपना सुपरमैन, छोटा सा बजरंग बली, जो उसे सकून पहुंचाता है। टीवी चैनल प्रयत्नपूर्वक उसकी इस छवि को मांजते हैं- इस स्मृति की छौंक लगाते हुए कि वह हिमाचल के एक गरीब घर का लड़का है जो अपने बूते वहां तक पहुंचा है। यानी नायक बनाने की एक पूरी प्रक्रिया यहां देखी जा सकती है। लेकिन असल सवाल है कि खली का यह खेल समाचार चैनल क्यों खेलें? इसका भी जवाब साफ है। वे ऐसे खेल पहले भी करते रहे हैं। ध्यान से देखें तो आईपीएल भी एक तमाशा है जो क्रिकेट की बारीकियों की वजह से लोकप्रिय नहीं हुआ है, बल्कि बिल्कुल डब्लूडब्लूई वाले अंदाज में दिखाई जाने वाली ताकत और उससे पैदा हुए रोमांच की वजह से टीवी का प्राइम टाइम लूट रहा है। क्या हमें आईपीएल इसलिए मंजूर है कि वह कुछ ‘अपमार्केट’ किस्म का तमाशा है जिसमें बॉलीवुड से लेकर शराब उद्योग तक का पैसा लगा है और जिसमें नाचने के लिए विदेश से बालाएं बुलाई जा रही हैं और खेलने के लिएड्ढr दुनिया भर से खिलाड़ी खरीदे गए हैं। जबकि खली ‘डाउन मार्केट’ है जो अपनी कल्पनाशून्यता में कहीं ज्यादा खीझ पैदा करता है? अगर हरभजन का थप्पड़ दिन भर चलाई जा सकने वाली खबर है तो खली का मुक्का क्यों नहीं?ड्ढr दरअसल खली हो या आईपीएल- दोनों समाचार चैनलों के एक ही संकट के अलग-अलग चेहर हैं। 24 घंटे खबर दिखाने की चुनौती के साथ बाजार में खड़े कुछ दर्जन चैनलों को सिर्फ आपसी स्पर्धा ही नहीं करनी पड़ती है, उन सैकड़ों मनोरांन चैनलों से भी भिड़ना पड़ता है जो टीवी को ज्यादा से ज्यादा रंगीन और दिलकश बनाने में जुटे हैं। इस होड़ में खबरों के चैनल कभी किसी मनोरांन चैनल का ग्लैमर उधार ले आते हैं और कभी किसी खेल चैनल का शिगूफा, कभी यू टय़ूब की कोई सनसनीखे क्िलप और कभी किसी खली से भिड़ने को तैयार हो जाते हैं। लेकिन यह सार भटकाव इसलिए हैं कि समाचार और समाचार को पुनर्परिभाषित करने का उद्यम और साहस दोनों कम हैं। हिंदी चैनलों में कई खली बैठे हैं जो हिंदी दर्शकों पर भरोसा नहीं करते। उन्हें लगता है कि संजीदगी से दिखाई जाने वाली खबरं हिंदी का अनपढ़ और गंवार दर्शक नहीं देखता। उनकी टीआरपी उन्हें इसके प्रमाण भी सुलभ कराती है जहां संजीदा कहे जाने वाले किसी कार्यक्रम के मुकाबले कोई चालू तमाशा हिट नजर आता है। लेकिन मुश्किल यह है कि जो लोग खुद को संजीदा बताते हैं, खली से दूर रहते हैं, वे कुछ ऐसा प्रस्तुत नहीं करते जिसमें हिंदी का व्यापक संसार अपने आप को जोड़ सके। उनके पास राजनीति की बेहद आमफहम खबरं और बहसें होती हैं, सरोकार के नाम दिल्ली में बैठकर देखा गया विदर्भ होता है, विचार के नाम पर चालू जुमलों में निबटाया गया आरक्षण, महिला आरक्षण या सूचना का अधिकार होता है। यानी यह संगीदगी किसी संजीदा दर्शक को भी तृप्त नहीं कर पाती। उसे इस शून्य और सन्नाटे से भला वह शोर लगता है जो आईपीएल के मैचों में होता है।

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