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हुसेन पर फैसले का कैनवास बड़ा है

अखिल सिब्बल एक बार फिर एक खास मुकदमे में अपनी जीत को लेकर चर्चा में हैं। एक फनकार की अभिव्यक्ित की स्वतंत्रता के लिए, वो भी वर्षीय जाने-माने पेंटर मकबूल फिदा हुसेन की भारत माता की पेंटिंग पर उठी कुछ कट्टरवादी उंगलियों को उन्होंने मरोड़ा है। साथ ही सस्ती लोकप्रियता के लिए जानी-मानी हस्तियों के अनावश्यक उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं पर अंकुश लगाने की दिशा में भी उन्होंने महत्वपूर्ण पहल की है। हालांकि पेशेवर वकील के तौर पर वे अपने मंत्री पिता कल सिबल से भी ज्यादा व्यस्त हैं। पर समय निकालकर वे हुसेन मामले में हाईकोर्ट से अपने पक्ष में आए फैसले पर हमार प्रतिनिधि प्रदीप संगम से रू-ब-रू हुए एफ एम हुसेन के मामले में आपको मिली जीत के मुख्य आधार बिंदु क्या हैं? भारत माता की जिस पेंटिंग को लेकर हुसेन साहब पर आरोप लगाए गए थे। उन पर हाई कोर्ट के फैसले में साफ तौर पर दो बातें निर्णीत की गई। एक तो यह कि पेंटिग उत्तेजक या अश्लील नहीं है। दूसर यह कोई धार्मिक कंटेंट नहीं है, इसलिए धार्मिक भावनाओं को इससे किसी तरह की ठेस पहुंचने का मुद्दा ही नहीं बनता। कोर्ट का मानना था कि हमारे इतिहास और संस्कृति में जो नग्नता या सेक्सुअलिटी रही भी है, इन्हें अश्लील कभी नहीं समझा गया। यह फैसला एक बड़े कैनवस पर लिखा गया है। कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल और लॉ कमिशन से भी इस दिशा में संज्ञान लेने को कहा है कि सेलिब्रिटीा को नाहक परशान करने के लिए अदालतों का बेजा इस्तेमाल न हो।ड्ढr इस संवेदनशील मुद्दे को शुरू में आपने किस नजरिए से देखा? मेर सामने जब यह मामला आया तो मेरा मानना यही था कि यह कला और कलाकार की अभिव्यक्ित की स्वतंत्रता पर अनावश्यक हमला और फनकार को बेवजह उत्पीड़ित करने की घृणित कोशिश है। हुसेन पिछले 60 वर्ष से चित्रकारी करते आ रहे हैं। नफरत की राजनीति करनेवालों का मकसद उनके खिलाफ अलग-अलग क्षेत्रों में मामले दायर कर उन्हें बेवजह परशान करने का था। इस मामले में मुझे साफ नजर आया कि उनकी पेंटिंग को लेकर लगाए जा रहे आरोप आधारहीन थे और यही हमने कोर्ट को बताया।ड्ढr क्या कला अभिव्यक्ित की आजादी की सीमा रखा इस हद के पार जाती है कि आप दूसरों की भावनाओं को आहत कर सकते हैं?ड्ढr देखिए कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा है और यह बेहद महत्वपूर्ण भी है कि जिसे आप अश्लील मान रहे हैं वह दरअसल प्यूरटिम है। कोर्ट भी इस लक्ष्मण रखा को मानता है कि यदि कोई जानबूझकर दूसरों को उत्तेजित करने की नीयत से कला का भौंडा प्रदर्शन करता है तो वह जरूर आपत्तिजनक हो सकता है। लेकिन, मैं मानता हूं कि अभिव्यक्ित की आजादी आपको अधिकार देती है कि आप शांतिपूर्ण विरोध करं या अपनी बात कहें। लेकिन आप किसी को जान से मार डालने का ईनाम कैसे घोषित कर सकते हैं?ड्ढr यह फैसला अभिव्यक्ित की स्वतंत्रता को लेकर चल रहे दूसर मामलों को किस हद तक प्रभावित कर सकता है?ड्ढr यह फैसला तमाम दूसर एसे मामलों के लिए एक आदर्श नाीर का काम करगा जो जानी-मानी हस्तियों के खिलाफ अलग-अलग क्षेत्रों में जानबूझकर एक समान मुद्दों को गढ़कर दाखिल किए जाते हैं। इनका मकसद सेलिब्रिटीज को अदालतों में घसीट कर सस्ती लोकप्रियता पाना, उनका अनावश्यक उत्पीड़न करना व उनसे कुछ फायदा उठाना होता है। इस फैसले में हाईकोर्ट ने तमाम न्यायालयों को सलाह दी है कि एसे मामलों में वे अतिरिक्त सतर्कता बरतें। अनावश्यक मामलों को दमदार आधार होने पर ही तवज्जो दें।ड्ढr खुद आपकी राय इस फैसले को लेकर क्या बनी है?ड्ढr मेरे हिसाब से अभियक्ित की स्वतंत्रता को लेकर एसे पूर्वाग्रह नहीं होने चाहिए कि जिसकी वजह से किसी रचनात्मक कार्यशील कलाकार को देश छोड़कर भागना पड़े। आप खुद सोचिए कि एक वर्ष की उम्र का चित्रकार, जिसने पूरी जिन्दगी हिन्दुस्तान में कला की सेवा में गुजारी हो, उसका देश से बाहर जाकर रहना हमार सार जागरूक समाज के लिए गंभीर चुनौती है। एसे में आया कोर्ट का फैसला लोगों को गहरी नींद से जगाने वाला है। पूर्वाग्रह में नफरत और स्वार्थो की राजनीति करने वालों के अभियान पर यह फैसला प्रहार करता है।ड्ढr हुसेन के खिलाफ बाकी मामलों की क्या स्थिति है ?ड्ढr कुल सात मामले सामने थे। इनमें से तीन के अलावा एक मामला तो खुद बखुद खत्म हो गया है। जाहिरन अन्य मामलों पर भी इस फैसले का असर तो पड़ेगा।ड्ढr क्या इस फैसले के बाद हुसेन के भारत लौटने की संभावना है?ड्ढr उनके स्वदेश लौटने में कोई कानूनी अड़चन तो अब नहीं है। पर इस बार में फैसला लेना उनका व्यक्ितगत निर्णय है। असल में तो अभिव्यक्ित कीड्ढr आजादी के तमाम पक्षधरों का र्फा बनता है कि वे अब हुसेन साहब कोड्ढr इसके लिए मनाएं कि वे सम्मान के साथ स्वदेश लौटें। अदाल और मीडिया ने तो साथ दिया ही है, उन्हें सरकार की तरफ से भी सुरक्षा का आश्वासनड्ढr दिया जाना चाहिए।ं

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