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मेरिट सूची जारी भी की जा सकती है।

अंतत: यही फैसला हुआ कि यू.पी. बोर्ड की हाईस्कूल और इंटर परीक्षाओं के नतीजों के साथ मेरिट सूची जारी की जाएगी। पहले माध्यमिक शिक्षा मंत्री ही ने घोषणा की थी कि मेरिट सूची जारी नहीं करंगे। फिर कुछ दिन बाद उन्होंने बयान बदलकर कहा था कि मेरिट सूची जारी भी की जा सकती है। फिर शुक्रवार को एक बैठक के बाद फाइनल फैसला हुआ कि हाँ, मेरिट सूची की जाँच कराने का भी कोई लाभ नहीं है। यह माँग भी थी कि मेरिट में आने वाले छात्रों की कॉपियाँ सबको दिखाई जाएँ। कोई दुराव न हो और लोग जान सकें कि मेरिट में आने वाले बच्चे प्रश्नों का हल कैसे लिखते हैं। यह माँग भी ठुकरा दी गई है। अर्थात यू.पी. बोर्ड के इम्तिहानों में किसी भी तरह की पारदर्शिता जिम्मेदार लोगों को मंजूर नहीं है। जो परदे में है उसे परदे में रहने दो। परदा जो उठ गया तो..।ड्ढr यू.पी. बोर्ड की परीक्षाओं की शुचिता वर्षो पहले जाती रही। हर साल परीक्षा केन्द्रों से लेकर मेरिट सूची पर विवाद उठते हैं और जाँच की माँग की जाती है। मेरिट सूची में कुछ ही निजी विद्यालयों के छात्रों की भरमार रहती है। एक ही विद्यालय के कई-कई छात्र मेरिट में क्रमवार जगह पाते हैं। कभी गुमनाम से ये स्कूल रातों रात ख्याति पा जाते हैं। जबकि मेरिट में आने वाले छात्र दो-चार दिन की प्रसिद्धि के बाद गुमनाम हो जाते हैं। असल मसला छात्रों की प्रतिभा चमकाना नहीं, दुकान बन गए निजी स्कूलों का धंधा चमकाना है। स्कूलों की मान्यता, परीक्षा केन्द्रों का निर्धारण और परीक्षा-प्रणाली में सेंध के किस्से आम हैं। साल भर ये हैरतअंगेज किस्से अखबारों में छाए रहते हैं लेकिन शिक्षा -माफिया का मकड़जाल इतना मजबूत है कि उसको काट पाना मुश्किल है। माध्यमिक शिक्षक संघ जाने कब से यह माँग कर रहा है। शिक्षा मंत्री ने इस बार यह कोशिश की थी लेकिन ताजा फैसले के बाद अब यह नामुमकिन लगता है।ड्ढr आईसीएसई और सीबीएसई कहीं ज्यादा प्रतिष्ठित संस्थाएँ हैं। उनकी मान्यता और सम्मान के आगे यू.पी. बोर्ड कहीं नहीं ठहरता। ये दोनों ही संस्थाएँ अपने नतीजों के साथ मेरिट सूची जारी नहीं करतीं। इसके कई वाजिब कारण हैं। एक तो यही कि मेरिट सूची चंद प्रतिभाशाली छात्रों के सम्मान से ज्यादा कहीं बड़े छात्र-समुदाय की कुण्ठा का कारण बन जाती है क्योंकि हमारी परीक्षा प्रणाली (साल भर की पढ़ाई का तीन घण्टे में मूल्यांकन) सवरेत्तम छात्रों के चयन का आधार किसी भी तरह नहीं है। इसी कारण अब बहुतेर स्कूल कक्षा में छात्रों प्रथम, द्वितीय, तृतीय.. का गड्र भी नहीं देते। खैर..।ड्ढr यू.पी. बोर्ड का टॉपर होना कभी गर्व की बात रही होगी लेकिन अब यह संस्था वैसी स्वच्छ नहीं रह गई। यह रोचक शोध का विषय हो सकता है कि हाईस्कूल की मेरिट सूची वाले छात्र-छात्राएँ आने वाले वर्षो में कहाँ पहँुचते हैं और क्या-क्या करते हैं। कई तो इण्टर में ही गुमनाम हो जाते हैं। इसके विपरीत मेरिट सूची में छा जाने वाले निजी विद्यालयों की कमाई कहाँ से कहाँ पहँुच जाती है। ऐसे स्कूल अपने को मेरिट सूची वाले विद्यार्थी पैदा करने वाली संस्था के रूप में प्रचारित करते हैं। यू.पी. बोर्ड से संबद्ध निजी व सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूलों और कोचिंग संस्थानों में अब कोई फर्क नहीं रहा। और सरकारी स्कूल इस होड़ से बाहर हो गए। उनके विद्यार्थी अपवाद स्वरूप ही कभी मेरिट सूची में जगह पाते हों। जिस तरह किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में सफल छात्र-छात्राओं को ‘अपना विद्यार्थी’ बताने की होड़ कोचिंग संस्थान करते हैं, वैसी ही होड़ बोर्ड से संबद्ध निजी स्कूलों में होती है। वे मेरिट सूची पर कब्जा करने के लिए क्या-क्या यत्न नहीं करते। इन स्कूलों के प्रबन्धकोंस्वामियों और शिक्षा विभाग व बोर्ड के अफसरों का नापाक गठजोड़ हाल ही में एक उच्चाधिकारी की जाँच रिपोर्ट में सामने आया था, जिसे ‘हिन्दुस्तान’ ने प्रकाशित भी किया था। यह जाँच रिपोर्ट बताती है कि शिक्षा माफिया और आला अफसरों का गठजोड़ कितना मजबूत और पुराना है। कैसे-कैसे स्कूल मान्यता पा गए, काली सूची में डाले गए स्कूल कैसे साल दर साल परीक्षा केन्द्र बनाए जाते रहे, कैसे ऐन मौके पर परीक्षा केन्द्र बदले जाते रहे और कैसे इस गठजोड़ को तोड़ने की कोशिश करने वाले खुद किनार कर दिए जाते रहे। मेरिट सूची जारी नहीं करने की शिक्षा मंत्री की घोषणा का अंतत: क्या हश्र हुआ! अगर इसमें सब कुछ पाक-साफ होता है तो फिर उन छात्रों की कॉपियाँ सबको दिखाने में क्या हर्ज है? पारदर्शिता से आखिर किसे डर लगता है और क्यों?वर्षो से बिहार माध्यमिक शिक्षा परिषद के छात्र यह अपमान झेलते आए हैं कि उनके हाईस्कूल-इण्टर के अंक पत्रों को बिहार के बाहर भारी सन्देह की नजर से देखा जाता है और उन्हें सत्यापन करा लाने को कहा जाता है। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद के छात्रों के सामने भी अब यह अपमानजनक स्थिति आने लगी है जबकि कभी उसकी बड़ी साख थी। शिक्षा की दुकानदारी और माफिया स्तर की जकड़न ने उसका यह हाल कर दिया है। इससे मुक्ित का रास्ता ढँूढ़ने की इस बार की कोशिश तो नाकाम हो गई।ं

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