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असाधारण व्यक्ितत्व के स्वामी थे सत्यदेव बाबू

असाधारण व्यक्ितत्व के स्वामी थे साधारण कद के सत्यदेव नारायण तिवारी। धोती-कुर्ता और बंडी का पहनावा। सिर पर गांधी टोपी, यही थी उनकी विशिष्ट पहचान। तकरीबन तीन दशक तक सक्रिय राजनीति में रहनेवाले तिवारी जी अपने समकालीन राजनीतिक सखाओं से कुछ हटकर थे। गांव के मुखिया, पंचायत समिति के प्रमुख, जिला परिषद के उपाध्यक्ष, जिला पंचायत परिषद के अध्यक्ष, बिहार विधान परिषद के सदस्य, रांची खूंटी को-ऑपरटिव बैंक के अध्यक्ष, बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष, बिहार खनिज विकास निगम के उपाध्यक्ष और न जाने कितने सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक संगठनों से जुड़ कर उन्होंने काम किया। लेकिन उनकी आत्मा झारखंड की सांस्कृतिक विरासत में बसती थी। नागपुरी कला संगम उनकी शुभ्र सांस्कृतिक प्रांजलता का ही परिचायक था। जिसकी स्थापना 1में की थी। रांची से सटे अतिसाधारण गांव बोड़ेया का यह शख्स झारखंड के गांव-गांव तक नागपुरी भाषा, संस्कृति, साहित्य और कला के प्रचार-प्रसार के लिए मृत्युपर्यन्त जुटा रहा। 1से 1तक तीन बार बिहार विधान परिषद के सदस्य रहने, लंबे समय तक कांग्रेस की सक्रिय राजनीति से जुड़कर काम करने के बाद भी तिवारी जी अजातशत्रु बने रहे। संघर्ष कर उन्होंने जीवन की ऊंचाइयों को पाया। अहंकार, दंभ और राजनीति के अन्य विकार कभी उनको छू भी नहीं पाये। तिवारी जी राजनीति के आधुनिक फ्रेम के लिए फिट नहीं थे। इनका जाना राजनीति के धुरंधर व्यक्ितत्वों के एक युग का अंत है। श्र्रद्धांजलि सभा आज स्व. सत्यदेव नारायण तिवारी के सम्मान में रविवार को शाम पौने छह बजे बोड़ेया स्थित उनके आवास पर शोकसभा आयोजित की गयी है। उनके श्राद्धकर्म के तहत द्वादशा और ब्राह्मण भोज का भी कार्यक्रम रविवार को ही होगा।

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