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परमाणु मसले पर विशेषज्ञों के निशाने पर वाम

परमाणु करार के मुद्दे पर वामदलों की संप्रग सरकार को बार-बार दी जा रही धमकियों के बीच रक्षा वैज्ञानिक और विशेषज्ञों ने वामदलों की आलोचना करते हुए उनकी विचारधारा को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। जहां पूर्व राष्ट्रपति डा.एपीजे अब्दुल कलाम और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र भारत-अमेरिकी परमाणु करार की पैरवी कर रहे हैं, वहां वाम दलों ने इसके विरोध में सरकार को चेतावनियों की झड़ी लगा रखी है। पोखरण-2 से जुड़े रक्षा वैज्ञानिक के.संथानम और रक्षा विशेषज्ञ के. सुब्रह्मण्यम जसे लोग चाहते हैं कि देश के ऊरा विकास कार्यक्रम के लिए अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को अमली जामा दिया जाए। विशेषज्ञों से बातचीत से स्पष्ट है कि वे वामदलों के रवैये काफी नाराज हैं। सुब्रह्मण्यम ने ‘हिन्दुस्तान’ से कहा कि वामदल नहीं चाहते कि भारत परमाणु क्षेत्र में आगे बढ़े। इसका कारण पूछने पर उन्होंने वामदलों की विचारधारा को कटघर में खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा है कि जसे किसी धार्मिक मुद्दे में तर्क का कोई स्थान नहीं होता वैसे ही वामपंथियों की विचारधारा किसी तर्क को नहीं मानती। सरकार चाहे तो वामदलों के दबाव को दरकिनार कर इस समझौते को मंजूर कर सकती है लेकिन इसके लिए उसे समयपूर्व चुनाव के लिए तैयार होना होगा। अब यह सरकार और अन्य राजनीतिक दलों पर निर्भर है कि क्या वे समयपूर्व चुनाव के लिए तैयार हैं। सुब्रह्ण्यम को अब भी उम्मीद है कि देश की अगली सरकार जरूर परमाणु समझौते पर दस्तखत करगी। जाने-माने परमाणु वैज्ञानिक के.संथानम के मुताबिक वामदल अब तक औद्योगिक व कृषि मजदूरों की राजनीति करते रहे हैं।ड्ढr अचानक उन्हें परमाणु कार्यक्रम जसे जटिल विषय पर महारत कहां से हासिल हो गई! उन्होंने वामपंथियों को ‘पार्टी ऑफ कनविनियंट मेमरी’ करार दिया है। संथानम का कहना है कि वामदल अक्सर यह आशंका जताते हैं कि भारत अमेरिका का पिछलग्गू हो रहा है।

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