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क्रांति ने राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोया

विद्रोहियों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष हिन्दू-मुसलिम एकता को बनाये रखने के लिए था। कई हुक्म निकाले गये थे। 28 से 30 जुलाई, 1857 में मनाये जाने वाले ईद-उल-जोहा में गो-बलिदान पर रोक लगायी गयी थी एवं इसे तोड़ने वालों के लिए सजा-ए-मौत तय की गयी थी। इसी आंदोलन में लड़ाई के समय बिगुल की आवाज सुनाई पड़ सके, इसके लिए मुहर्रम में ढोल-ताशे बजाने की भी मनाही की गयी थी। ज्वालानाथ नामक हिंदू ने जेनरल बख्त खान से कुछ लोगों को भेजने का अनुरोध किया था, जो कुरान की आयतें पढ़ सकें और विजय के लिए दुआ करं।ड्ढr अंग्रेजों के विरुद्ध दोनों मुख्य धर्मो की राष्ट्रप्रम संधि मातृभूमि से लगाव पर आधारित थी। जहां इस क्रांति का अभियान गीत अजीमुल खान द्वारा लिखा गया था, वहीं झांसी की रानी पठान वेष धारण करती थीं और कुरान की आयतें पढ़ती थीं, उनके रक्षक मुसलमान थे और उनकी चिता को एक मुसलमान ने अग्नि दी थी। अवध की बेगम बिरजिस कद्र ने जून 1857 में हिन्दी और उर्दू में साथ-साथ छपे इश्तेहारनामा में अंग्रजों को हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्म पर हमला का आरोपी बताया था।ड्ढr दिल्ली से प्रकाशित एवं मोहम्मद बाकिर द्वारा संपादित साप्ताहिक के 14 जुलाई के अंक में अहलेवतन से अपील कर हिन्दुओं और मुसलमानों से अपनी धार्मिक पुस्तकों एवं आस्था का ध्यान करते हुए अपने-अपने ईश्वर पर भरोसा कर अंग्रजों से युद्ध करने के लिए एकजुट होने का आह्वान किया। इसके 1जुलाई के अंक में देशवासियों से अपील कर हिन्दू और मुसलमान दोनों को एक ही संस्था का अंग समझने को कहा गया।ड्ढr भारतीय राष्ट्रीयता दूसर पश्चिमी देशों की तरह भाषा पर आधारित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र और इसकी राष्ट्रीयता बहुसांस्कृतिक सभ्यता की देन है। गुलाम रसूल की किताब ‘1857 के मुजाहिद’ में बेगम हजरत महल, नाना साहब के साथ-साथ रानी लक्ष्मीबाई को भी मुजाहिद के नाम से संबोधित किया गया है।ड्ढr बहादुरशाह के 1857 के चार फरमानों में से पहले में अपने व्यक्ितगत लाभ के लिए हिन्दुस्तान पर शासन करने की शाह की अभिलाषा नहीं होने की बात की गयी थी और किसी भी प्रकार से अंग्रजों को हिंद से खदेड़ देने एवं भारत को स्वतंत्र देखने की इच्छा जाहिर की गयी थी। आजादी मिलने के बाद सर्वसम्मत से चुने गये व्यक्ित, चाहे वह शासक का वारिस न हो, वह हिंदू हो या मुसलमान हो, को राजकीय शक्ित सौंपने की प्रतिज्ञा भी थी।ड्ढr उनकी दूसरी, तीसरी एवं चौथी घोषणाओं में हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों को हिन्दुस्तान की औलाद, सभी हिन्दुओं और मुसलमानों तथा हिन्दुस्तान के हिन्दुओं और मुसलमानों के तौर पर संबोधित कर किसी भी प्रकार से अंग्रजी साम्राज्य के खात्मे की अपील की गयी थी। यह एक तहरीर है, जिससे उस समय के धर्मनिरपेक्ष शासक द्वारा हिन्दुओं और मुसलमानों को एकता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस युद्ध को लड़ने की जरूरत बतायी गयी थी। अंतत: बहादुरशाह जफर धर्म एवं जाति से पर भारतीय समाज को एकीकृत करने में सफल हुए। इसी प्रकार के धार्मिक प्रतीक हिन्दू-मुसलिम एकता, देशभक्ित आदि की बातें संग्राम के सभी अग्रणी नेताओं की घोषणाओं, आदेशों, कथनी एवं करनी द्वारा परिलक्षित हुईं।ड्ढr झारखंड में भी टिकैत उमरांव सिंह और शेख भिखारी साथ-साथ लड़े और साथ-साथ फांसी पर चढ़े। 1857 की क्रांति ने राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने के अभूतपूर्व एवं असंभव काम को अंजाम दिया। (समाप्त)ं

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