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राजनीतिक तमाशे पर ब्रेक,कानून का राज

रीब डेढ़ दशक बाद उत्तर प्रदेश में बनी बहुमत की सरकार ने पहला साल पूरा कर लिया। गए साल इसी वक्त जब पूर्ण बहुमत लेकर मुख्यमंत्री मायावती के नेतृत्व में बहुान समाज पार्टी की सरकार बनी थी तो आम लोगों की पहली आस यही थी कि अब सूबे को राजनीतिक स्थिरता मिलेगी। बसपा सरकार इस कसौटी पर सोलह आने खरी उतरी है। सरकार की स्थिरता ने जहाँ राजनीतिक तमाशे की परम्परा पर ब्रेक लगाया है वहीं सरकार के इकबाल खास तौर पर कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर प्रशासन की हनक बढ़ाई है और विकास योजनाओं की बयार भी बहाई है। पहले साल की नींव पर अब और बड़े लक्ष्य पूर्ति की मजबूत इमारत बनाने को सरकार ने अपनी पहली प्राथमिकता बनाया है। अफसरों के साथ हालिया बैठक में खुद मुख्यमंत्री मायावती ने बेलाग कहा कि शपथ लेने के बाद जो लक्ष्य उन्होंने दिए थे उन पर पूरा अमल नहीं हुआ। अब आगे यह नहीं चलेगा। यानी मायावती का संदेश साफ है- आगे के चार साल में शासन-प्रशासन को सरकार की कसौटी पर हर हाल में खरा उतरना होगा। ढिलाई बर्दाश्त नहीं होगी।ड्ढr मायावती ने विधानसभा चुनाव के दौरान जनता से जो सबसे बड़ा वादा किया था वह था प्रदेश में कानून का राज स्थापित करने का। अपनी हर प्रचार सभा में उन्होंने गुण्डों-माफियाओं की अराजकता खत्म करने का जनता को भरोसा दिलाकर खूब तालियाँ बटोरी थीं और वह इसे पूरा करने में एक हद तक सफल भी रहीं हैं। बेहतर कानून-व्यवस्था, सख्त प्रशासन और बेलगाम अफसरशाही पर लगाम कसने के लिए मायावती जानी जाती रही हैं और उनके नेतृत्व में चौथी बार यूपी में बनी सरकार भी उसी नक्शेकदम पर है। कानून का राज देने में बाधक बने अपनी पार्टी के सांसद को मुख्यमंत्री आवास से गिरफ्तार कराने में उन्हें कोई गुरज नहीं रहा तो गाड़ियों में बसपा का नीला झण्डा लगाकर सड़कों का अनुशासन बिगाड़ने वालों को भी वह सबक देने में पीछे नहीं दिखीं। पहली बार किसी शासक दल की मुखिया ने पुलिस को शासक दल के झण्डों वाली गाड़ियों को चेक करने की छूट दी। एक बात और जो उनके हिस्से में जाती है वह यह कि तमाम आशंकाओं के विपरीत मायावती सरकार ने राजनीतिक विद्वेष से कोई कार्रवाई नहीं की। उलटे पार्टी की बैठक में यह नसीहत देते दिखीं कि फलदार वृक्ष सदैव झुका रहता है। संगठित अपराध रोकने के लिए यूपीकोका, राज्य सुरक्षा आयोग, कानून-व्यवस्था की समीक्षा के लिए दर्ज एफआईआर की जगह की गई कार्रवाई को आधार बनाने जैसे कई फैसले सरकार की कानून का राज स्थापित करने की प्रतिबद्धता को जाहिर करते हैं।ड्ढr मायावती की नई सोशल इंजीनियरिंग ने बहुमत की सरकार बनाई। लिहाजा सरकार गठन के साथ ही मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया कि उनकी सरकार ‘सर्वजन हिताय, सवर्जन सुखाय’ की नीति पर चलेगी। इसकी छाप इस एक साल में सरकार के हर अहम फैसले पर दिखी। फिर चाहे वह निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने की बात हो या गरीब सवर्ण छात्रों को छात्रवृत्ति या शादी, बीमारी के लिए शासकीय सहायता देने का सवाल हो। चार साल में केन्द्र की संप्रग सरकार निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने का जो फॉमरूला ढूँढ़ नहीं सकी उसे मायावती सरकार ने कुछ महीनों में लागू करके दिखा दिया कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ित के आगे कुछ भी असंभव नहीं। उनके इस फैसले को दूसर फॉलो करते दिखे। यही नहीं, सरकार अपने राजनीतिक एजेण्डे को भी पूरा करती दिखी। चाहे वह कई साल से सरकारी भर्तियों में बैकलॉग पूरा करना हो या गरीब, भूमिहीनों को पट्टे देने का मामला हो या फिर सामान्य भर्ती पर लगी रोक हटाने का। डेढ़ साल पहले बसपा संस्थापक स्व. कांशीराम के निधन पर मायावती ने सरकार आने पर दलितों के मसीहा को यथोचित सम्मान देने का एलान किया था। सरकार आने पर उनके नाम पर एक नए मान्यवर कांशीराम जिले से लेकर तमाम विकास योजनाओं और विभिन्न क्षेत्रों में पुरस्कार की शुरुआत हुई। 11वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक बिजली के मामले में यूपी को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई नई परियोजनाओं की शुरुआत, सूबे में सड़कों का जाल बिछाने के लिए वित्तीय वर्ष खत्म होने से काफी पहले काम खत्म हो जाने के सख्त निर्देश और ठेका पाने में माफिया, दबंगों को रोकने के लिए महत्वाकांक्षी ई-टेण्डरिंग योजना की पहल जैसे काम मौजूदा सरकार की बड़ी उपलब्धियों में शामिल हैं।ड्ढr लोकतंत्र में चुनाव को जनता की कसौटी माना जाता है और ऐसे में विपक्षी आलोचनाओं से इतर अगर देखा जाए तो हालिया उपचुनावों में दो लोकसभा और तीन विधानसभा सीटों पर बसपा प्रत्याशियों को एकतरफा जीता कर जनता ने भी मायावती सरकार के एक साल के कामकाज पर मुहर लगाई है। ड्ढr ड्ढr

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