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राजरंग

बड़ा शोर था शहर में उस दिन। सुबह से मानो उत्सव का माहौल था। दुकान-दुकान, होटल दर होटल ढूंढ़-ढूंढ़कर बच्चों को बाहर निकाला गया। हाय-हाय, ये उम्र तो खेलने-खाने की है और नासपीटे इनसे हाड़तोड़ काम ले रहे हैं। एसे में खुद सरकार बहादुर सड़क पर उतर कर इन नन्हें-मुन्नों को नरक से निजात दिलाने आ गये, यह कम अच्छी बात है। अर इसी को कहते हैं सरकार और एसा होता है मंत्री। सबको साथ लेकर खाते-पिलाते, भविष्य का सपना दिखाते सरकार बहादुर और उनका लाव-लश्कर खूबे फोटू-तोटू भी छपवा लिये। बचवन भी खूबे खुश था। उ लोग को भी लगा कि अब तो उनका जीवन सफल होइये जायेगा। सो हंसी-खुशी बचवन होटल और दुकान से निकल-निकलकर सरकार बहादुर संग चल दिया। पहिला दिन तो ठीके-ठाक रहा। लेकिन जइसे-ाइसे दिन बीता, रात आयी बचवन का पेट कुलबुलाने लगा। काम से निकालकर सरकार बहादुर कुछ दिये, तो नहीं। ऊपर से खाने पर भी आफत। सो हालतवा खराब होवे लगा। बचवन भी सोचे लगा कि अब न इधर के रहे न उधर के। सो चला जाये, जहां थे, वहीं चैन से काम करं। कम से कम भर पेट खनवा तो मिलिये जायेगा। तीसरा दिन सब बच्चा फिर अपन-अपन ठिकाना पकड़ लिया। इसी को कहते हैं- लौटकर बुद्धू घर को आये ।

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