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सूक्तदृष्टा महर्षि अत्रि

महर्षि अत्रि एक वैदिक सूक्तदृष्टा ऋषि थे। पुराणों के अनुसार इनका जन्म ब्रह्मा जी के नेत्र या मस्तक से हुआ था। सप्तर्षियों में महर्षि अत्रि की भी गणना होती है। वैवस्वत मन्वन्तर में अत्रि एक प्रजापति थे। इनकी पत्नी कर्दम प्रजापति और देवहूति की पुत्री अनसूया थीं। श्री राम वनवास को जाते हुए, सीता और लक्ष्मण के साथ अत्रि के आश्रम में भी आए थे। देवी अनसूया को पतिव्रताओं की आदर्श और शालीनता का दिव्य प्रतीक थीं। ‘वाल्मीकि रामायण’ के अनुसार, महर्षि अत्रि ने स्वयं अनसूया का गुणगान करके कहा था कि विदेहनन्दिनी सीता को इनसे मिलना चाहिए। अत्रि ने अनसूया का परिचय देते हुए कहा था- ‘एक समय दस वर्षो तक वृष्टि नहीं हुई, उस समय जब सारा जगत निरन्तर दग्ध होने लगा, तब जिन्होंने उग्र तपस्या से युक्त तथा कठोर नियमों से अलंकृत होकर अपने तप के प्रभाव से यहां फल-मूल उत्पन्न किए और मन्दाकिनी की पवित्र धारा बहाई तथा जिन्होंने दस हाार वर्षो तक बड़ी भारी तपस्या करके अपने उत्तम व्रतों के प्रभाव से ऋषियों के समस्त विघ्नों का निवारण किया था, वे ही यह अनसूया देवी हैं।’ इसके बाद सीमा जी ने अनसूया जी के दर्शन किए थे। अनसूया ने उन्हें निरंतर ताजी रहने वाली माला, वस्त्र, भूषण, उबटन, अनुलेपन आदि दिए थे। ऋग्वेद में अत्रि की एक कथा का बार-बार उल्लेख आता है। उसके अनुसार अत्रि को अत्यधिक ताप हो रहा था, तब अश्विनीकुमारों ने इनका उपचार किया था। इन्हें कुछ समय के लिए कारागृहवास करना पड़ा था, क्योंकि इन्होंने जनता का पक्ष लेकर राजा से टक्कर ली थी। यह लोकशासित राज्य व्यवस्था के लिए प्रयत्न कर रहे थे। इन्हें ‘पांचजन्य’ भी कहा गया है।ड्ढr महर्षि अत्रि कृत दो ग्रंथों का उल्लेख मिलता है- ‘अत्रि संहित’ और ‘अत्रि स्मृति’। ‘अत्रि संहिता’ में नौ अध्याय तथा चार सौ श्लोक हैं। महर्षि अत्रि की वेदों के प्रति गहरी आस्था थी। वह कहते हैं- ‘वैदिक मंत्रों के अधिकारपूर्वक जप से सभी प्रकार के पाप-क्लेशों का विनाश हो जाता है।ं

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