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अजरुन खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ ..

राजनीति इस वक्त एक बेहद दिलचस्प और निर्णायक मोड़ पर नजर आ रही है। चुनावी अखाड़े में कूदने को तत्पर छोटे-बड़े पहलवान उस चौराहे तक पहुंच चुके हैं, जहां से कदम उन्हें कहीं भी ले जा सकते हैं, मनोवांछित मंजिल तक या भटका कर किसी बियाबान में। बात अगर इतनी सी होती तो हम मगजमारी न करते। मगर भविष्य का घटनाक्रम देश की तरक्की या बर्बादी के साथ भी जुड़ा ही होगा। अत: घटनाओं को सिर्फ मनोरंजन के रूप में लेना आत्मघातक भी सिद्ध हो सकता है। सबसे पहले जिक्र जरूरी है, अब तक नम्बर-10 जनपथ के नवरत्नों में एक समझे जाने वाले अजरुन सिंह का। महाभारत में इसी नामधारी पांडव की ख्याति अचूक तीरंदाज के रूप में थी। इस धनुर्धर का एक और नाम था सव्यसाची- जो दोनों ही हाथों से धनुष चला सकता था। अद्वितीय पराक्रम के अलावा कुछ और प्रसंग इस पात्र के साथ जुड़े हैं। अज्ञातवास के दौरान किन्नर बृहनल्ला के रूप में जीवनयापन और कुरुक्षेत्र के मैदान में रणभेरी सुनते ही निर्वीर्य कायरता का प्रदर्शन। हमारी आंखों के सामने खड़े राजनेता का कोई साम्य इस पौराणिक पात्र के स्वभाव या प्रकृति से नहीं दिखलाई देता। तीरों की बौछार वह दोनों हाथ स करते जरूर हैं, पर लक्ष्यभेद में अधिकतर चूक जाते हैं। उन्हें कभी भी अज्ञातवास में रहे बेहतर समय लौटन की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। उनकी अदा और अंदाज हमेशा शत्रुओं को ही नहीं, मित्रों को भी ललकार कर चुनौती देने वाले रहते हैं। उन्हें यह उपदेश देने की हिम्मत साक्षात् श्रीकृष्ण भी नहीं कर सकते- क्लैब्यं मास्म गम: पार्थ! सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने हाल-फिलहाल ओबीसी आरक्षण विषयक उनके हठ पर कानूनी मुलम्मा चढ़ा दिया हो इसे निर्णायक जीत कहना कठिन है। मलाईदार परत की परिभाषा का सरदर्द बचा है और विद्वान न्यायमूर्ति यह टिप्पणी कर चुके हैं कि आरक्षण को अनिश्चितकाल तक जारी रखना देश की एकता को विभाजित ही कर सकता है और वैमनस्य को बढ़ाने वाला ही सिद्ध हो सकता है। इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ मैनेजमेंट और आईआईटी जैसी उत्कृष्ट शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता वाली बहस हो या जामिया या अलीगढ़ विश्वविद्यालय जैसे सरकारी अनुदान से पोषित केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को अल्पसंख्यक संस्थाओं के वर्ग में रख इन्हें विशेषाधिकारों से सपन्न करना, अजरुन सिंह जी का योगदान हठधर्मी और विवादास्पद भी रहा है। कभी जिस र्तुे वाली पगड़ी या फुदने वाली टोपी पहन कर अपन को अल्पसंख्यक वर्ग का रहनुमा खैरख्वाह बनन का लालच मुलायम सिंह को था, वैसी ही कुछ उतावली इन्हें भी जान पड़ती है। उनसे उपकृत हो जामिया के उपकुलपति ने अपने परिसर में एक वीथि का नामकरण अपने इस हितैषी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करते हुए कर दिया था। अजरुन सिंह ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई और न ही वे संकोचग्रस्त हुए। होते भी क्यों? वह तो स्वयं एक ही सांस में कांग्रेस पार्टी में जनतंत्र के अभाव की आलोचना करते हुए शासक परिवार के प्रति असली वफादारी की घोषणा करने में समर्थ हैं। जब उन्होंने यह ऐलान कर डाला था कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उपयुक्त दावेदार हैं और इनकी अभिषेक की तैयारी की जानी चाहिए तो श्रीमती सोनिया गांधी को स्पष्ट कहना पड़ा था कि वह और राहुल दोनों ही दरबारी चाटुकारिता पसंद नहीं करते। इस अनुभव से भी उन्होंने कोई सबक नहीं सीखा। वैसे ही, जैसे उन्होंने कुछ वर्ष पूर्व सोनिया के उस सलाह को अनसुना कर दिया था, जब उन्होंने इनकी 25वीं वर्षगांठ पर सुझाया था कि उन्होंने अपने सुदीर्घ सार्वजनिक जीवन में बहुत देश सेवा और जन सेवा कर दी है। अब वह संतोष के साथ अवकाश ग्रहण कर सकते हैं। इस बात को भी खासा समय बीत गया है, पर निश्चय ही मानव संसाधन मंत्री पद त्याग के मूड में नहीं। उनकी मुद्रा आज भी आ बैल मुझको मार वाली ही है। जहां वह जाते हैं, वहीं महाभारत छिड़ जाता है। चाहे उनके संस्मरणों ‘मोहे कहां विश्राम’ का विमोचन हो या फिर 1857 की डेढ़ सौवीं जयंती का समापन समारोह। प्रश्न अजरुन सिंह जी के राजनैतिक भविष्य का नहीं, बल्कि वास्तव में कांग्रेस की बेबसी का है। क्या कारण है कि अपनी नाराजगी दर्शान के लिए सोनिया गांधी सिर्फ दुआ सलाम की औपचारिकता तक नहीं निभाती, सार्वजनिक मंच पर मुंह दूसरी ओर फेर लेती हैं, मगर प्रधानमंत्री उन्हें अपने मंत्रिमंडल में इच्छानुसार लाठी-तलवार भांजने के लिए निरंकुश छोड़ देते हैं? मुसीबत और भी विकट है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता कभी लोकसभा अध्यक्ष रह चुके पी. एन. संगमा ने चौपड़ में एक नया पांसा फेंका है, कुछ-कुछ शकुनी मामा वाले अंदाज में। उन्होंने सुझाया है कि कांग्रेस और भाजपा को मिलकर केन्द्र में सरकार बनानी चाहिए, क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियां राष्ट्रहित साधन में बाधक हैं। सवाल बेहद पेचीदा है। जहां एक ओर रामदास, बालू, करुणानिधि, लालू जी और झारखण्ड के स्वनामधन्य गुरु जी शिबू सोरेन के उदाहरण हैं, संगमा की बात सौ फीसदी सही लगती है। पूर्ववर्ती सरकार में शिव सेना ने ऊर्जा मंत्री प्रभु साहब की बर्खास्तगी जिस अंदाज में करवायी थी, उससे भी यही बात पुष्ट होती है। मगर यह सोच पाना असंभव है कि धर्मनिरपेक्षता का ध्वज फहराते भगवाधारी हिन्दुत्ववादियों से आर-पार की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाली कांग्रेस भाजपा स कैसे हाथ मिलायेगी? वामपंथी पहले ही सिन्धवादी बूढ़े की तरह उसकी गर्दन अपने टांगों की कैंची में फंसाये हैं। अगर धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिकता विरोधी मोर्चे के निर्माण की पेशकश के लिए कांग्रेस की आलाकमान अमर सिंह-मुलायम सिंह द्वय के सामने समर्पण की मुद्रा अपना चुकी है, तब क्या वह पीछे लौटन का जोखिम उठा सकती है? तब क्या इस सब का अर्थ यह लगाया जाए कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी नई पीढ़ी के आधुनिक मिजाज वाले भाजपाई महत्वाकांक्षी नेताओं को यह संकेत दे रही है कि जरूरत पड़ने पर नए समीकरण तलाशते वक्त कम स कम वह उन्हें अटूट नहीं समझते?ड्ढr इसके अलावा इस बारे में भी ठंडे दिमाग से सोचने-विचारन की जरूरत है कि क्या भारत जैसे उपमहाद्वीपीय आकार के विशाल देश में जो तरह-तरह के विविधता से भरा पड़ा है, क्षेत्रीय दलों स कभी भी पूर्णत: मुक्ित पाई जा सकती है? खासकर उस स्थिति में, जब हमारी संघीय व्यवस्था संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार संचालित नहीं हो रही हो और सत्तारूढ़ दल का आचरण पक्षधरता रहित न हो। जिन्हें हम राष्ट्रीय पार्टियों के रूप में पहचानते हैं, उनकी असलियत क्षेत्रीय ही बची हुई है। इसलिए संगमा ने जो सवाल उछाला है, उसके जवाब स कांग्रेसी ही नहीं भाजपाई भी मुंह नहीं चुरा सकते।

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