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आरक्षण की माया अति पिछड़ा होना सुहाया

राज्य में एनेक्सर दो में आने वाली लगभग दो दर्जन जातियां अति पिछड़ी जाति की सूची में शामिल होना चाहती हैं। पंचायत चुनाव में अति पिछड़ी जातियों को 20 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के बाद विभिन्न जातीय संगठनों के बीच नए सिर से सुगबुगाहट शुरू हो गई है। एक जमाने में पिछड़ी जातियों के संगठन अपने को श्रेष्ठ जाति की सूची में शामिल कराना चाहते थे। आरक्षण की माया है कि पिछड़ी जातियां अब निचली श्रेणी में शामिल होना चाहती हैं। पिछड़ी जातियों द्वारा अति पिछड़ी जाति में शामिल कराने के लिए लगभग दो दर्जन जातीय संगठनों ने अति पिछड़े वर्गो के लिए गठित आयोग को आवेदन दिए हैं। आवेदन देने वाली जातियों में तेली,हलवाई, दांगी, चौरसिया, लहेरी, लोहार, कलाल, बढ़ई , पटवा, कुर्मी (ायसवार), चनऊ आदि जातियों के संगठन शामिल हैं। आयोग को दिए गये आवेदनों में कहा गया है कि उनकी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक हालात अति पिछड़ी जातियों की तरह है। इसलिए उन्हें अति पिछड़ी जाति में शामिल किया जाए। सीतामढ़ी की कुर्मी जाति के लोगों ने आवेदन दिया है। नीतीश सरकार ने अति पिछड़ी जाति आयोग का गठन किया है।ड्ढr ड्ढr राज्य में अति पिछड़ी जातियों की संख्या 104 है। सरकारी नौकरियों में अति पिछड़ी जातियों को बारह प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है और मध्यम जातियों को आठ प्रतिशत। पंचायतों के चुनाव के बाद आरक्षण के कारण बड़ी संख्या में अति पिछड़ी जाति के लोग पंचायत निकायों में चुृने गए हैं। इसका असर यह हुआ है कि विभिन्न जाति संगठन अब अपने को अति पिछड़ी जाति में शामिल कराना चाहते हैं। इसके पहले भी पिछड़ी जाति में आने वाले कई जातियों को अति पिछड़ी जाति की सूची में शामिल किया गया है। 1में अति पिछड़ी जातियों की संख्या थी। बिहार में यह पहला मौका नहीं है जब जाति संगठन अपनी जाति को नीचे की श्रेणी में शामिल कराना चाहते हैं। जातियों के श्रेणीकरण का सिलसिला भी चलता रहता है। कुछ जातियां अपने को अनुसूचित जाति में शुमार कराना चाहती हैं। गरा यह कि आरक्षण के कारण लाभ मिलने का अवसर अधिक बढ़ जाता है।ं

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