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विस बनी विधायकों की प्राइवेट कंपनी

झारखंड में सत्ता की मलाई विधायक और मंत्री जमकर काट रहे हैं। ठेका, पट्टा तो अपने हित-कुटुंबों के बीच बांटते ही हैं, नौकरी-चाकरी भी अपने परिवार के सदस्यों के लिए सुरक्षित करवा कर रख लेते हैं। सरकारी विभाग हो या संवैधानिक संस्था, सभी जगह इनकी ही तूती बोलती है। माननीयों ने तो सूबे की सर्वोच्च पंचायत को एक तरह से प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बना कर रख दिया है। विधायक बनते ही हर माननीय को एक अदद निजी सहायक की जरूरत होती है। सभापति बन गये, तो एक अनुसेवक का भी प्रावधान बन जाता है। प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए निजी सहायक का पज सृजित होता है। निजी सहायक रखने के लिए विधायक अनुशंसा करते हैं। लेकिन शर्त यही है कि निजी सहायक के पद पर रखा जानेवाला शख्स उनका रिश्तेदार नहीं होगा। विधायकों को इस आशय का एक प्रमाण पत्र भी देना पड़ता है। इसके बावजूद कई माननीयों ने अपने परिवार के सदस्यों को ही निजी सहायक बनवा दिया है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी इस कुव्यवस्था के समान भागीदार हैं।ड्ढr सूबे के कई माननीयों की सूची दी गयी है और उनके नाम के सामने उनके निजी सहायक के नाम दिये जा रहे हैं। अब क्षेत्र की जनता और स्वयं माननीय इसका खुलासा करंगे कि निजी सहायक उनके कौन हैं?

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