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नाम के लिए

किसी वक्त में मुंबई को महिलाओं के लिए बेहद सुरक्षित महानगर माना जाता था। पिछले दिनों महिलाओं के साथ बदसलूकी और बलात्कार के कई मामले सामने आए, कुछ में पुलिस वाले ही आरोपी थे। पुणे भी एक जमाने में ज्ञान और प्रगतिशील विचारों का प्रतिनिधि शहर था अब वहाँ भी अपराध और अपसंस्कृति काफी बढ़ गई है, लेकिन महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर. आर. आटिल को इस बात की चिंता है कि कोई इन शहरों को बांबे या पूना नहीं कह दे। शिवसेना को यह चिंता हो तो समझ में आता है, शिवसेना हमेशा ही व्यर्थ के मुद्दों पर ही हो-हल्ला करती आई है लेकिन पाटिल तो शिवसैनिक नहीं हैं, वे इस आग को बुझाने की बजाय उसमें घी डालने का काम क्यों कर रहे हैं। यह बहुत स्पष्ट था कि शिवसेना अपने वोट बढ़ाने के लिए उत्तर भारतीयों को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही थी तभी राज ठाकर ने उत्तर भारतीयों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। इस आंदोलन की कोई औकात नहीं होती अगर महाराष्ट्र सरकार ने इसके साथ नरमी नहीं बरती होती। अब राज ठाकर की प्रतिस्पर्धा में शिवसेना भी फिर से संकीर्ण मुद्दों की राजनीति करने लगी है और महाराष्ट्र की कांग्रेस-राकांपा सरकार बहुत छोटे स्वार्थो के लिए इस खतरनाक राजनैतिक प्रवृत्ति को हवा दे रही है। मुंबई या पुणे या बंगलुरू जसे स्थानीय परंपरागत नाम इस्तेमाल करने का तर्क तो समझ में आता है लेकिन यह तर्क जब दुराग्रह बन जाता है तो वह खतरनाक हो जाता है। कहीं कोई मुंबई को बांबे या पुणे को पूना कह दे तो उससे पहाड़ नहीं टूट पड़ता और यह आंदोलन करने का मुद्दा तो नहीं बनता। इन दिनों चुनावों की सुगबुगाहट हवा में है और कोई छोटा-मोटा मुद्दा भी विस्फोटक बन सकता है। ऐसे में सरकार में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि ऐसे विस्फोटक मुद्दों को शुरू में ही कुचल डाले। लेकिन पाटिल जसे लोगों को मुंबई की सुरक्षा की जगह उसके नाम का ख्याल ज्यादा है।ं

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