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विकास : फिर भी पिछड़ा रहेगा उत्तर प्रदेश

अगर ऐसा होता है तो एक बीमारू प्रदेश के स्वस्थ होने की आशा की जा सकती है, लेकिन प्रचार को वास्तविक मान लेने के लिए कोई ठोस धरातल अभी तो कहीं दिखाई नहीं देता। प्रदेश सरकार ने 2008-0े अपने बजट भाषण के दौरान इस बात का जिक्र किया था कि देश की प्रतिव्यक्ित आय तथा प्रदेश की प्रतिव्यक्ित आय में लगभग 50 प्रतिशत का अंतर है। ऐसे में जब राष्ट्रीय स्तर पर असमानता की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है तो फिर प्रदेश सरकार उससे 50 प्रतिशत पीछे रहते हुए आखिर कैसे घोषित लक्ष्य प्राप्त करने में सफल हो जाएगी? सरकार ने यह घोषणा तो कर दी है कि आय के इस अंतर को आने वाले दस वर्षो में कम कर देगी और इन वर्षो के दौरान प्रदेश की प्रतिव्यक्ित आय को बढ़ाकर दो गुना कर लिया जाएगा। यही नहीं इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए 11वीं पंचवर्षीय योजना के लिए 10 प्रतिशत की विकास दर का लक्ष्य रखा गया है जिसमें कृषि क्षेत्र में विकास दर 5.7 प्रतिशत, विनिर्माण क्षेत्र में 11.5 प्रतिशत। इसके लिए पहला कदम यही होना चाहिए था कि प्रदेश में बीमार औद्योगिक इकाइयों का पुनरुद्धार किया जाए और नई इकाइयों की स्थापना के लिए वातावरण तैयार हो, लेकिन अभी तक इस दिशा में सरकार की कोई पहल दिखाई नहीं दे रही है। कम से कम वित्त वर्ष 2008-0े बजट में सरकार ने जिन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया है उनमें लघु उद्योग क्षेत्र नहीं आता है। सरकार के दावों का सिर्फ एक ही पैमाना है और वह है ‘पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप’। प्रदेश सरकार की नई आर्थिक नीति का यही सर्वश्रेष्ठ उपकरण है जिसके माध्यम से सरकार अपने सीमित साधनों के बावजूद भी विकास की प्रक्रिया तेज करने का स्वप्न देख रही है। लेकिन सरकार की जो आरक्षण संबंधी शर्ते हैं उससे प्राइवेट पूँजी को खुले तौर पर नहीं, तो छुपे तौर पर अवश्य ही ऐतराज होगा। औद्योगिक विकास के लिए तीन कारण प्रमुख रूप से और भी जिम्मेदार हैं। इनमें से पहला है- इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में व्यापक सुधार, दूसरा- दक्ष और संवेदनशील कानून व्यवस्था, साथ ही पूँजी निवेश के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना। जहाँ तक इन्फ्रास्ट्रक्चर का प्रश्न है तो इस क्षेत्र में प्राथमिक जरूरत बिजली के रूप में ऊरा की है, जो पूँजी साधनों को गतिशील बनाने के लिए अनिवार्य है। लेकिन उत्तर प्रदेश विद्युत उत्पादन और उपभोग दोनों ही मामलों में फिसड्डी है। प्रदेश में प्रतिव्यक्ित बिजली की उपलब्धता राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले आधी ही है और अगर राज्य प्रतिव्यक्ित उपलब्धता के मामले में राष्ट्रीय स्तर को प्राप्त करना चाहता है तो चार से साढ़े चार हाार मेगावाट अतिरिक्त बिजली तत्काल उत्पादित करनी होगी। राज्य सरकार ऐसा कर पाने में तो अक्षम है लेकिन मूल्यों में वृद्धि करती जा रही है जिसका असर औद्योगिक उत्पादन और मूल्यों पर अवश्य ही पड़ेगा । भारतीय औद्योगिक संघ का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार राज्य में छोटे और मझोले उद्योगों की समस्याओं को दरकिनार कर रही है क्योंकि आयोग ने लघु उद्योगों के लिए बिजली दरों में 22 फीसदी की वृद्धि कर दी है, जबकि घरलू स्तर के उपभोक्ताओं के लिए इसे 8 फीसदी ही बढ़ाया है। आईआईए का यह भी कहना है कि उत्तर प्रदेश में बिजली के खराब हालात और पड़ोसी राज्यों से मिल रही कड़ी प्रतियोगिता को देखते हुए लघु उद्योगों का राज्य में अपनी साख को बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है। लघु उद्योगों के मामले में यदि अन्य प्रदेशों से उत्तर प्रदेश की तुलना की जाए तो वह बहुत पीछे नहीं आता है बल्कि तमिलनाडु और महाराष्ट्र के बाद उसी का नम्बर है, लेकिन प्रति इकाई रोगार देने के मामले में वह अन्य राज्यों के मुकाबले बहुत पीछे है। केवल इसी दृष्टि से नहीं बल्कि राज्य के सकल घरलू उत्पाद में भी उद्योगों का हिस्सा अपेक्षाकृत अन्य राज्यों से कम है। उत्तर प्रदेश में कृषि के बाद सबसे अधिक रोगार देने वाला क्षेत्र लघु उद्योग क्षेत्र ही है, लेकिन नई आर्थिक नीति के आगमन के बाद से न केवल उत्तर प्रदेश में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर लघु उद्योगों के बीमार होने की समस्या सर्वाधिक घातक हो चली है, जिसका प्रभाव रोगार से लेकर आर्थिक विकास तक पर स्पष्ट तौर पर पड़ता दिखाई दे रहा है। भारत सरकार द्वारा सम्पन्न कराए गए सव्रे के अनुसार, लगभग 43 प्रतिशत लघु औद्योगिक इकाइयां बंद हो चुकी हैं। ऐसे में ‘समतामूलक समाज व्यवस्था’ की स्थापना तो दूर, उसका भ्रम भी नहीं हो सकता।ड्ढr ं

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