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कोसी के कहर को नहीं भूले ग्रामीण

कोसी के कहर को नहीं भूले ग्रामीण

छह वर्ष पूर्व कोसी की भयावहता में कुसहा बांध टूटने से हुई तबाही का दर्द और मंजर लोग भूले नहीं थे, कि एकबार फिर 'बिहार का शोक' कही जाने वाली कोसी नदी के कहर के भय के कारण जिंदगी अस्त व्यस्त हो गई।

कोसी के कहर के भय से लोगों को अपनी घर-गृहस्थी छोड़कर शिविरों में पनाह लेनी पड़ी है। नेपाल में शनिवार को हुए भूस्खलन के कारण कोसी की धारा में अवरोध आ जाने से बिहार में बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। बिहार में कोसी तटबंध पर बसे गांवों के लोगों को गांव खाली करवा कर सुरक्षित स्थानों पर राहत शिविरों में भेजा जा रहा है।

घर-गृहस्थी से अलग होने और विस्थापित जिंदगी बिताने का दर्द यहां के लोगों के चेहरों पर साफ दिखता है, लेकिन जान की सलामती के लिए घर-बार छोड़ने को लोग हर वर्ष मजबूर होते हैं।

सुपौल जिला स्थित मध्य विद्यालय बभनी में बने शिविर में अपनी नन्ही सी बिटिया के साथ रहने आई मीनाक्षी देवी कहती हैं कि सोमवार को पुलिस उन्हें यहां लेकर आई। उनके पति रामसुंदर अपना घर छोड़ना नहीं चाहते थे। घर की देखभाल के लिए वह रुकना चाहते थे, लेकिन उन्हें भी शिविर में आना पड़ा।

कोसी के तट में बसे गांवों के वासियों का कहना है कि कोसी का क्रोध कब किस मां की गोद सूनी कर दे, कोई नहीं जानता। सुपौल की रहने वाली संध्या अपने पिता से नाराजगी जताते हुए उस समय को कोसती है, जब उसके पिताजी ने उसका रिश्ता कोसी के तट वाले गांव में कर दिया था।

बिहार में कोसी के तटबंधों में बसे सैकड़ों गांवों के ग्रामीणों को भले ही कोसी से शिकवा शिकायतें हैं, लेकिन हर साल कोसी के रौद्र रूप से बचने के लिए लोग यहां प्रार्थनाएं और कोसी की पूजा अर्चना कर उसे मनाने का प्रयास करते हैं।

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