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अब तक कोसी ने 8 बार तटबंध को भेदने की कोशिश की

1956 में शासन व प्रशासन के अथक प्रयास से कोसी की उफनती धारा को दो तटबंधों के बीच बांध तो दिया गया लेकिन कोसी तटबंधों के बीच कैद कोसी अब तक आठ बार तटबंध को तोड़ अपनी पुरानी राहों पर निकलने को बेताब दिखी। कोसी ने जब भी अपनी धारा को मोड़ने का प्रयास किया तो कुछ नया ही हुआ या तबाही आई।

कोसी नदी ने अब तक तीन बार नेपाल प्रभाग व पांच बार भारतीय प्रभाग में तटबंध को तोड़ निकलने का प्रयास किया। कोसी दो बार तीन वर्ष के अंतराल में, दो बार चार वर्ष के अंतराल में एक बार पांच वर्ष पर, एक बार 9 वर्षों पर राह बदलती रही। लेकिन 18 अगस्त 2008 को आई प्रलयंकारी बाढ़ में कोसी ने 17 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद तटबंध को तोड़ पुरानी राहों पर निकलने का प्रयास किया। 

कोसी ने सबसे पहले 1963 में डलवा (नेपाल) में तटबंध को तोड़ निकलने का प्रयास किया। उस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री विनोदानंद झा थे। फिर पांच वर्षों के बाद 1968 में जमालपुर के पास पांच जगहों पर दरभंगा में कोसी ने तटबंध को लांघने का प्रयास किया। उस वक्त बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू था। अभी लोग उस जख्म को भूल भी नहीं पाये थे कि तीन वर्षों के बाद कोसी ने पुन: 1971 में भटनियां के समीप एप्रोच बांध को तोड़ डाला।

उस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री थे। इसके बाद कोसी कुछ शांत दिखने लगी। लेकिन पुन: 9 वर्षों के अंतराल के बाद 1980 में सलखुला प्रखंड में बहुअरवा के पास जब कोसी तटबंध को तोड़ अपनी पुरानी राह पर पर निकली तो इंजिनियरों के होश उड़ गए। उस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र थे। अभी वह जख्म भरा भी नहीं था कि 4 वर्षों बाद कोसी पुन: 1984 में केदली पुनर्वास के पास तटबंध को लांघ पूरब दिशा में निकल पड़ी।

यह त्रासदी उस वक्त तक की सबसे बड़ी त्रासदी थी। कोसी ने उस समय इलाके में काफी क्षति पहुंचायी। गांव का गांव खाली हो गया। लोग बेधर हो गए। उस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर सिंह थे।  फिर 1987 में पश्चिमी तटबंध जमालपुर के दक्षिण गंडौल और समानी में कोसी ने इंजिनियरों को चुनौती दे डाली और तटबंध को तोड़ डाला। उस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री विंदेश्वरी प्रसाद यादव थे।

फिर चार वषों के बाद नेपाल के जोगनियां के पास तटबंध को तोड़ कोसी निकल पड़ी। उस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव थे। इस घटना के बाद लोग यह मानने लगे कि कोसी अब शांत हो गयी है। लेकिन 18 अगस्त 2008 को कुसहा तटबंध को तोड़ कोसी जब अपनी पुरानी राह पर निकली तो तबाही की कहानी लिख गई।

इस घटना को याद कर आज भी लोगों की रूह कांप उठती है। बल खाती कोसी ने देखते ही देखते कई गांवों को निगल लिया। खेतों में लगी फसल को बर्बाद कर डाला। इतना ही नहीं कितनी जिंदगी लील ली, कितनी मां की गोद सूनी हो गयी। कितनी मांगों का सिंदूर मिट गया। आज भी उस प्रलय का जख्म इलाके से नहीं मिट पाया है।

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