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पीड़ितों की आंखों से उतर नहीं रहा कुसहा त्रासदी का मंजर

कोसी के खौफनाक मंजर की आहट से घर-द्वार छोड़ फारबिसगंज व आसपास के क्षेत्रों में रह रहे करीब दस हजार पीड़ितों की आंखो से उतर हीं नहीं उतर पा रहे हैं। वह इसलिए क्योंकि 2008 की प्रलंयकारी कोसी की बदली धारा ने अररिया जिले के लगभग 95 हजार परिवारों के करीब 04 लाख आबादी का जीवन अंधकारमय बना दिया था। इनके पास न तो खेती बची थी और न ही जीवन जीने का कोई साधन।

पिछले 18 अगस्त को कुसहा बांध टूटने के लगभग 17 घंटे बाद 19 अगस्त को कोसी की धारा ने  जिले के नरपतगंज प्रखंड में दस्तक दी थी। अगले ही दिन 20 अगस्त को दिन के 12 बजे भरगामा तथा तीन बजे अपराह्न् में फारबिसगंज प्रखंड में बर्बादी की शुरुआत हुई थी।  22 अगस्त को रानीगंज प्रखंड को अपने आगोश मे समेट कर पूर्णिया की ओर रूख कर गयी थी। उसके बाद तो समय के साथ लोग घिरते चले गए थे। तबाही बढ़ती चली गई थी।

आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार प्रलंयकारी बाढ़ ने अररिया जिले के चार प्रखंडों की 64 पंचायत के लगभग 102 गांवों के करीब 95 हजार परिवारों के तीन लाख 95 हजार  की आबादी काफी प्रभावित किया था। इसके अलावा इन तीनों प्रखंडों के तकरीबन 44 हजार 947 हेक्टेयर में खेती बर्बाद हो गयी थी। करीब नौ हजार मकान भी क्षतिग्रस्त हो गए थे।

इस मामले में बाढ़ राहत नियंत्रण शिविर से संबंधित प्रतिवेदन के अनुसार जिले के चार प्रखंडों की 12 पंचायत पूर्ण रूप से प्रभावित थीं जिनमें जिसमें नरपतगंज के बेला, बबुआन और पथराहा, रानीगंज के विस्टोरिया, जगताखरसाही, मझुआ पश्चिम, काला बलुआ, कोशकापुर उत्तर, कोशकापुर दक्षिण, बगुलाहा, भरगामा के सिमरबनी व शंकरपुर शामिल थीं।

इन चारों प्रखंडों की 44947 हेक्टेयर खेती को प्रभावित बताया गया था जिसमे नरपतगंज के 7 हजार, रानीगंज के 6550 हेक्टेयर शामिल थे। प्रतिवेदन में इन चारो प्रखंडोन के कुल 8269 मकानों को क्षतिग्रस्त बताया गया था, इनमें नरपतगंज के 2885, फारबिसगंज  के 1553, भरगामा के 2163 व रानीगंज के 1668 मकान शामिल थे। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मृतकों की संख्या 02 थी।

परेशानियां टोकरी में मगर राहत चुटकी भर भी नहीं
जल-प्रलय के खौफ से घर-द्वार छोड़ जिंदगी की जद्दोजहद में फंसे पीड़ितों को राहत बेशक चुटकी भर न मिली हो लेकिन परेशानियां टोकरी भर जरूर हैं। प्रशासन विस्थापितों की मदद का लाख दावा करे लेकिन इन पीड़ितों को कोई भी सरकारी सुविधा नहीं मिल रही है।

रविवार की देर शाम जब डीआईजी राम नारायण सिंह फारबिसगंज आईटीआई पहुंचे तो पीडिम्तों को आस जगी कि शायद अब उनकी मुसीबत टलने वाली है, लेकिन ठीक 20 घंटे के बाद जब आईजी अमरेन्द्र कुमार के साथ डीआईजी पुन: इस स्थान पर आए तो पाने को कुछ भी नहीं था।

सुला देवी, बीवी नूरजहां, मैनी देवी उन अभागी माताओं में थीं जो अपने महज एक दो माह के मासूम को दूध के बदले पानी पिला रही थीं। वहीं जब विस्थापित उमेश दास से हालात के विषय मे पूछा गया तो वे फफक पड़े और कहा- साहेब कोसी त्रासदी में आंखों के सामने जीवछपुर का भोला ठाकुर और शिवा साह पानी में बह गए थे। वह सीन दिमाग से नहीं जाता। इसीलिए घर-वार छोड़ जल प्रलय से पहले वे लोग जिंदगी की तालाश मे यहां आ गए।

वहीं रेणु सार्वजनिक पुस्तकालय में रह रहे बलुआ के पीड़ित रंजित मिश्र ने कहा कि कोसी त्रासदी में बलुआ का बुनियाद मिट गया था। अब तो बाढ़ के नाम मात्र से देह में सिहरन पैदा होने लगती है। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने तो अभी तक सुध लेने का काम नहीं किया मगर यहां के स्थानीय लोग इतने अच्छे हैं कि उन लोगों को पता ही नहीं चल रहा है कि वे लोग जीवन के जद्दोजहद मे फंसे हुए हैं।

वहीं मदरसा आलिया दारूल कुरआन में पीड़ितों के चेहरे पर घर-वार छोड़ने का तनाव और राहत का संतोष देखा गया। पीड़ित मुजीबुर रहमान ने बताया कि सचिव ने बीती रात अपने घर पर सबको भोजन कराया और स्थानीय लोग हमेशा उन लोगों की खबर ले रहे हैं। उन लोगों ने कहा कि अभी तक प्रशासन ने उन लोगों की खबर नहीं ली है।

भाग कोहलिया और जगदीश साह धर्मशाला के पीड़ित ने भी कहा कि सरकार द्वारा उनकी खबर नहीं ली जा रही है। खास कर आईटीआई जहां सबसे ज्यादा पीड़ित रह रहे है वहां भी विस्थापितों के बीच सरकारी सहायता शुरू नहीं की गई है।

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