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सियासत की हद

ायपुर के सीरियल ब्लॉस्ट जसी आतंकवादी वारदातों से कैसे निपटा जाए, यह सवाल पिछले कई साल से देश को मथ रहा है। अगर हम यह मानते हैं कि देश ऐसी वारदात से निपट लेगा, तो इसका आधार हमारी यह धारणा है कि इस मसले पर हम एक हैं। आतंकवाद ही नहीं हिंसा तक को राजनीति से बाहर रखने के सवाल पर हमार राजनैतिक दलों में कोई मतोद नहीं। आतंकी हौसलों को पस्त करने के लिए इतनी सर्वसम्मति ही काफी है। आतंकवादियों के कितने भी बड़े धमाके या कितनी भी बड़ी वारदात हमार इस विश्वस को नहीं हिला सकती, लेकिन जयपुर विस्फोट को लेकर पिछले दो दिन में जिस तरह की राजनीति खेली जा रही है, वह अगर ज्यादा खिंची तो यह विश्वास हिल भी सकता है। सारी उंगलियां आतंकवादियों की तरफ उठनी चाहिए थीं, एक दूसर की तरफ उठने लगी हैं। आतंकवाद का मामला केंद्र और राज्य के रिश्तों का मामला नहीं होना चाहिए था, लेकिन वह हो गया है। इस बेतुकी लड़ाई में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री राज्य सरकार को दोषी बता रहे हैं तो मुख्यमंत्री और भाजपा के नेता केंद्र सरकार को। मुख्यमंत्री को कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी के घटनास्थल के दौर पर एतराज है तो केंद्र के नेता कह रहे हैं कि ऐसी घटनाओं की जांच राज्य की एजेंसी के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती, जहां आतंकवादियों ने धमाके किए थे । आतंकवादी जब इस तरह के विस्फोट करते हैं तो उनका निशाना विस्फोट की जद में आने वाले लोग नहीं होते, उनका निशाना होता है समाज की एकता। धमाकों के बाद अगर विभिन्न संप्रदाय भड़क उठें और आपस में भिड़ जाएं तो उनका मकसद पूरा होगा। अगर ऐसा न होना हमार समाज की मजबूती का प्रमाण है तो ऐसी वारदात के बाद एक न रह पाने को हमारी राजनीति की एक बड़ी कमजोरी मान लिया जाना चाहिए। समाज के साफ्ट टारगेट अगर अपनी रक्षा कर रहे हैं और राजनीति के हार्ड टारगेट अपनी रक्षा नहीं कर पा रहे तो यह ज्यादा खतरनाक चीज है। फिलहाल जरूरत यह है कि सर्वदलीय बैठक बुलाकर एक आचार संहिता तय की जाए। देश भर के राजनीतिज्ञों को यह बताया जाए कि आतंकवादी घटनाओं के बाद उन्हें किस तरह का व्यवहार करना चाहिए और किस तरह के बयान देने चाहिए। जो एकता का ककहरा नहीं सीख सकते उन्हें राजनीति करने का कोई हक नहीं है।ड्ढr

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