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शिखर पर अस्त

यह भरी दोपहर में सूर्यास्त होने जसा है। सफलता और प्रतिष्ठा के शिखर पर चढ़े किसी इंसान के लिए खेल को अलविदा कहना आसान नहीं होता। पिछले एक बरस से विश्व महिला टेनिस की अव्वल नम्बर खिलाड़ी जस्टिन हेनिन ने अचानक संन्यास की घोषणा कर सबको चौंका दिया। बेल्जियम की यह खिलाड़ी केवल पच्चीस वर्ष की है। सबको लगता था कि कोर्ट में उसके मारक बैकहैंड की गूंज लम्बे समय तक सुनाई देती रहेगी। पिछले बरस दो ग्रैंड स्लैम और आठ अन्य खिताब जीत कर उसने धूम मचा दी, किन्तु पेशेवर टेनिस के दबाव से उसकी हिम्मत टूट गई। ब्योर्न बोर्ग की भांति उसने भी शिखर पर रहते संन्यास की घोषणा की है। टेनिस ही नहीं, आज प्रत्येक खेल में दबाव में टूटने या भटकने वाले खिलाड़ियों की तादाद अच्छी-खासी है। जीत के जुनून, खेलों से जुड़े अकूत धन और प्रशंसकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की चाह के चलते खेल के मैदान कड़ुवे हादसों के केन्द्र बनते जा रहे हैं। आईपीएल मैच के दौरान हरभजन सिंह द्वारा साथी श्रीसंत पर हाथ उठाने का कारण भी दबाव ही था। बड़ा खिलाड़ी बनना कठिन है और बड़ा खिलाड़ी बने रहना तो लगभग असंभव है। फुटबाल के मैदान में देवता का दर्जा पा चुके माराडोना के पतन की दु:खद कथा भी दबाव की परिणति है। उस जसे महान खिलाड़ी को नशाखोरी के आरोप की जलालत झेलनी पड़ी। ऐसा नहीं है कि यह रोग केवल खिलाड़ियों तक सीमित हो। सफलता की चोटी पर चढ़ने वाले हर इंसान को आज कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। गलाकाट स्पर्धा के युग में मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए कठिन साधना करनी पड़ती है। इसीलिए पेशेवरों की दुनिया में योग और ध्यान का महत्व बढ़ता जा रहा है। शरीर को साधने के साथ-साथ भावनाओं को नियंत्रित रखना भी जरूरी है। कोर नैतिक उपदेश या दंड का डर दिखाकर खिलाड़ियों को काबू में रखना कठिन है। खिलाड़ियों के व्यवहार पर नजर रखने के साथ-साथ उनके असंयमित आचरण का कारण खोजा जाना भी जरूरी है।

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