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सुनते पवित, कहते पवित

मनुष्य का मन और मस्तिष्क डस्टबिन की तरह बन कर रह गए हैं। कितने ही अपवित्र और पथभ्रष्ट करने वाले तत्व इनमें जाने-अनजाने समाते जा रहे हैं। घर के भीतर और घर के बाहर भी कितने ही दृश्यों और ध्वनियों से मनुष्य भले ही अनजान बना रहता है किन्तु वे चेतन अथवा अवचेतन में घर बनाते रहते हैं और परशानी का सबब बनते हैं। लोगों के व्यवहार, उनके उच्चरित शब्द और ध्वनियां जिनका हमसे सीधा संबंध नहीं होता फिर भी हमार मन, मस्तिष्क में प्रवेश कर हमारी सकारात्मक ऊरा को नष्ट करने और नकारात्मक ऊरा उत्पन्न करने का कार्य करती हैं। मनुष्य ट्रेन में कितनी ही सुख सुविधा में बैठा हो चलती ट्रेन का प्रकम्पन उसे सहा नहीं होने देता। जो सांसारिक स्थितियां हैं, मनुष्य को उन्हीं में जीना है और उन स्थितियों में बदलाव हर किसी के बस का भी नहीं है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में इस संदर्भ में अति सटीक दिशा-निर्देश हैं कि ‘सुनते पवित, कहते पवित, सतगुर रहिआ भरपूर’ अर्थात परमात्मा असीम कृपा प्रदान करता है यदि मनुष्य जो कुछ सुने अथवा जिस पर ध्यान धर वह पवित्र हो, सत् पर आधारित हो और कहे भी वही जो पवित्र हो, कल्याणकारी हो, आनन्द देने वाला हो। मनुष्य अपने परिवेश, अपने संग-साथ को ऐसा रखे जो जीवन को सच के मार्ग पर ले जाने वाला हो। संसार के कदाचार इस आवरण को पार करके मनुष्य के मस्तिष्क और मन तक नहीं पहुंच सकेंगे। दूसरी ओर मनुष्य अपने जीवन से निर्थक क्रियाओं और व्यर्थ के शब्दों-ध्वनियों को निकालता रहे ताकि सकारात्मक ऊरा का संचय हो सके। जब तक जीवन सरल नहीं होता मनुष्य को आत्मिक शांति और आनन्द प्राप्त नहीं हो सकता। जीवन में जितनी भी उपलब्धियां अर्जित कर ली जाएं जीवन को सफल और सार्थक नहीं बनाया जा सकता। इन्हें पाने के प्रयास नकारात्मक ऊरा उत्पन्न करते हैं। हमें लगता है कि उपलब्धि प्राप्त होने पर सुख-आनंद मिलेगा और सारी नकारात्मकता धुल जाएगी। इससे पल भर का संतोष भले ही मिले किंतु अहम पनपता है और नकारात्मक ऊरा पहले से कहीं अधिक होकर कथित आनन्द को विलुप्त कर देती है।ड्ढr

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