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पूवरेत्तर के जख्म और मरहम

जिस पल आप असम के बाहरी क्षेत्रों से आगे निकल पड़ते हैं तो आपको पता चलता है कि आपने भारत के ‘मुख्य भाग’ को छोड़ दिया है। जिंदगी अचानक एक अलग मोड़ ले लेती है। किसी भी शहरी नागरिक की थकी आंखों को हरियाली अत्यंत सुखद लगती है। मानसून से पहले ब्रह्मपुत्र नदी का निम्नतम जलस्तर भी विस्मयकारी ढंग से प्रेरणादायी होता है, लेकिन यह कुदरती खूबसूरती, मंद गति से आगे बढ़ती चीजें, प्रचुरता और विभिन्न किस्म के पेड़-पौधे उस तनाव को नहीं छिपा पाते, जो सतह के ठीक नीचे मौजूद है। जब आप किसी इलाके में सेना के जवानों को गश्त करते हुए अचानक देखते हैं तो आपको स्थिति की झलक मिल जाती है। ऊपरी असम में सेना की मौजूदगी उतनी स्पष्ट नहीं है, जितनी कि कश्मीर में। लेकिन, सेना वहां है और याद दिलाती है कि इस खूबसूरत राज्य में सब-कुछ ठीक नहीं चल रहा है। असम के दूरवर्ती भागों में भी यह हकीकत आपको लगातार याद दिलाती है कि पूरा क्षेत्र ही पृथक बना हुआ है। तीन दशक से अधिक समय पहले ‘कनेक्िटविटी’ (सम्पर्क के साधनों की उपलब्धता) एक मसला था। असम और पूवरेत्तर के अन्य लोग एक-दूसर के क्षेत्रों और भारत के अन्य हिस्सों के साथ पहुंच कायम करने में साधनों के अभाव की शिकायत करते थे, लेकिन अब स्थिति सुधरी है। देश के ‘मुख्य भाग’ से पूवरेत्तर में आने के लिए अधिक उड़ानें और ट्रेनें उपलब्ध हैं। लेकिन, सातों बहनों यानी पूवरेत्तर के सात राज्यों के बीच ‘कनेक्िटविटी’ अभी भी बेहद कम है। इंटरनेट ने अपनी पहुंच का दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया है, पर बढ़िया से बढ़िया पहुंच-सुविधाएं अभी भी खस्ताहाल हैं और कहीं-कहीं तो मौजूद ही नहीं हैं। मुंबई के अखबारों के पहले पन्ने पर इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) क्रिकेट मैचों के छा जाने के कुछ दिनों बाद स्थानीय अखबारों को पढ़ने से राहत मिली कि खेल और बॉलीवुड का हो-हल्ला उनके लिए कोई चर्चित मसला नहीं है। इसके बजाय अखबारों ने मणिपुर में बम विस्फोटों, असम में एक सींग वाले एक गैंडे की मौत (ाो चोरी-छिपे शिकार की समस्या की याद दिलाता है) और उन नागरिक समस्याओं की खबरं छापीं, जिसका सामना असम की बुजरुआ राजधानी कर रही है। ‘मुख्य भाग’ की राजनीति और खेल कम प्राथमिकता में थे। यह यात्रा इस बात की भी याद दिलाती है कि अध्ययनों और रिपोर्टों के बावजूद पर्यावरण संबंधी गंभीर मसले किस प्रकार नजरअंदाज किए जा रहे हैं। राजमार्ग पर काझीरंगा नेशनल पार्क एक विश्व धरोहर स्थल है, जो एक दाग की तरह है। बसों के हॉर्न भारी शोर करते हैं और ट्रक डीाल का धुआं उगलते हैं। इसके बावजूद आप कहीं दूर स्थान में किसी गैंडे को वास्तव में देख सकते हैं, लेकिन पर्यावरण पर उस निरंतर हमले के मद्देनजर ये जानवर कब तक जिंदा बचेंगे, जो दिन-रात हो रहा है- केवल कुछ मीटर दूर, जहां वे चरते हैं और अपने इर्द-गिर्द दुनिया को शांतिपूर्वक देखते हैं। इन फर्क के बावजूद साझा समस्याएं हैं, लेकिन असाधारण चिंताएं- अलगाव, आहत, गुस्सा और अन्याय की भावनाएं भी व्याप्त हैं। पूवरेत्तर के किसी भी भाग में लोगों के समूह के साथ बातचीत सदा इन्हीं मुद्दों पर लौट आती है। विकास और पर्यावरण से जुड़े ऐसे अनेक मसले हैं, जिन पर रिपोर्टिग और प्रकाश डालने की जरूरत है। कुछ का समाधान इस क्षेत्र के भीतर ही मुमकिन है, जबकि अनेक मसलों पर केन्द्र सरकार की नीति में बदलाव जरूरी है। उदाहरण के तौर पर काझीरंगा से होकर गुजरने वाली सड़क के बार में फैसला स्थानीय स्तर पर नहीं लिया गया था, भले ही असम में किन्हीं न्यस्त स्वार्थो ने उसका समर्थन किया हो। पूवरेत्तर की महिलाएं उन मसलों की एक दिलचस्प उदाहरण हैं, जो साझा, किंतु भिन्न हैं। मेघालय में मातृसत्तात्मक समाज है- इस हकीकत के आधार पर यह धारणा बन गई है कि शेष भारत की तुलना में पूवरेत्तर की महिलाओं की स्थिति बेहतर है। क्षेत्र की नारीवादी अध्येता कहती हैं कि हकीकत में ऐसा नहीं है। उदाहरणार्थ, मेघालय में एक से दूसरी महिला के हाथों संपत्ति सुपुर्द की जाती है, पर राज्य में नीति निर्धारण करने वाली या पद पर निर्वाचित होने वाली महिलाएं बहुत कम हैं। अरुणाचल प्रदेश में महिलाओं को ग्राम परिषद में अनुमति नहीं दी जाती। भले ही पूवरेत्तर में महिलाओं की मौजूदगी स्पष्ट नजर आती है और वे आर्थिक क्षेत्र में सक्रिय हैं, लेकिन दहेा के रीति-रिवाज का भार उन पर नहीं है और क्षेत्र में एक सकारात्मक स्त्री-पुरुष अनुपात है। फिर भी, महिलाओं की वह स्थिति नहीं है, जो दिखाई पड़ती है। और इन महिलाओं को अपने परिवार के भीतर और समाज में अभी भी वही जंग लड़नी पड़ती है, जो अन्य जगहों पर महिलाओं का हाल है। यह देखना भी दिलचस्प है कि अधिक दूरदराज के इलाके के एक विश्वविद्यालय में युवा लोग समान होने के बावजूद भिन्न होते हैं। ऐसे ही एक विश्वविद्यालय में छात्रों से हुई चर्चा में उन्होंने भारत के ‘मुख्य भाग’ के छात्रों जसी ही समस्याएं प्रकट कीं। इन सभी चर्चाओं में ‘ड्रेस कोड’ कोई स्थायी समस्या नहीं है। महिलाओं को क्या पहनना चाहिए? क्या वे अपनी पसंद के वस्त्र पहन सकती हैं या उन्हें दूसरों के अनुरूप पहनना चाहिए? एक असाधारण समस्या लड़के-लड़कियों के बीच खुलकर मिलना-ाुलना है। कुछ लड़कियों ने कैम्पस में खुले तौर पर लड़कों के साथ लड़कियों के घूमने-फिरने पर असहाता प्रकट की। उनके अनुसार ऐसा व्यवहार अनुचित है। यह उनके लिए है, जो लड़कियां अपने घर से दूर विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर डिग्री की पढ़ाई कर रही हैं? कुछ ने कहा- हां, यह उनके अभिभावकों की पीठ के पीछे चल रहा है। तो क्या ये लड़कियां अपने लिए मां-बाप द्वारा खोजे गए उपयुक्त वर को पति के रूप में मंजूर करंगी। जसा कि आशा थी, इस बार में दो राय थी। कुछ ने साहसिक तरीके से घोषणा की कि वे ‘लव मैरिा’ करंगी, जबकि अन्य ने अभिभावकों की मंजूरी के साथ अपनी पसंद के लड़के से शादी को बेहतर बताया। कुछ ऐसी लड़कियां भी थीं, जिन्होंने अपने माता-पिता की मर्जी के मुताबिक फैसला लेना श्रेष्ठ माना। प्रतिनिधित्यात्मक उदाहरण के रूप में मेट्रो शहरों को छोड़ दें तो अधिकतर अन्य विश्वविद्यालयों में स्थिति संभवत: बहुत अलग नहीं पाई जाती है। युवा लोगों के बार में नई बात कटुता की कमी, विचारों में खुलापन, विचार प्रकट करने की इच्छुकता और वह आत्मविश्वास है, जो उनके सपने पूरा कर सके। क्या देश के ‘मुख्य भाग’ से दूरी का यह एक सकारात्मक पहलू है?ड्ढr ं

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