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इन्फ्रास्ट्रक्चर : कौन सिखाएगा सड़क संस्कार

इन्फ्रास्ट्रक्चर : कौन सिखाएगा सड़क संस्कार की धनराशि कहीं आसमान से नहीं टपकेगी। यह हमारी-तुम्हारी जेब से ही निकाली जाएगी, टैक्स के नाम पर या और किसी माध्यम से। इतनी बड़ी राशि खर्च कर तैयार सड़कों का रखरखाव भी महंगा होगा। अभी तक देश में बिछी सड़कों के जाल के रखरखाव पर सालाना खर्च इससे भी अधिक है। इतना होने के बावजूद देश की राानी दिल्ली से लेकर हर राज्य के कोने-कोने तक जनता यही झींकती मिलती है कि सड़कों की हालत बेहद खराब है। मुम्बई, बेंगलुरु, कोलकाता जैसे महानगरों में एक बारिश में सड़क व गड्ढों का भेद समाप्त हो जाता है, लेकिन यह नसीहत कौन दे कि लोगों को अब सड़क-इस्तेमाल करने के संस्कार सीखने होंगे। अभिप्राय तो सही तरीके से ड्राइविंग या पैदल चलने वालों को रास्ता देने के शिष्टाचार से होगा। यह एक चिंता का विषय है कि जिस देश में हर साल लगभग एक लाख लोग सड़क हादसों में मारे जा रहे हों, वहां तेज गति से वाहन चलने वाले सुपरफास्ट एक्सप्रेस-वे बनाना कहां तक न्यायोचित व प्रासंगिक है? एक्सप्रेस-वे पर चलने के सामान्य शिष्टाचार की धज्जियां उड़ती देखना हो तो राजधानी दिल्ली से 30-40 किमी दूरी पर मथुरा या करनाल हाईवे पर देख सकते हैं। यहां विपरीत दिशा में चलते वाहन, बैलगाड़ी या ट्रैक्टर का मनमाने तरीके से संचालन, ‘जुगाड़’ जैसे गैरकानूनी वाहनों में भरी भीड़ व ओवरलोड टैंपों या बसों की भागमभाग व ओवरटेक करते वाहन देखे जा सकते हैं। सड़क के व्यस्ततम समय में टोल नाकों पर वाहनों की लंबी लाइन और वहां पहले निकलने की जुगाड़ में एक दूसरे को धकियाते वाहन और उनको नियंत्रित करनेवाली किसी व्यवस्था का न होना दर्शाता है कि हिंदुस्तान के लोग अभी ऐसी सड़कों पर चलने के लायक नहीं हैं। साथ ही हमारी व्यवस्थाएं भी इतनी चाक चौबंद नहीं हैं कि 100 या 120 किमी प्रति घंटे की गति से वाहन दौड़ाने वाली सड़कों पर खूनी खेल होने से रोक सकें। सुपरफास्ट ट्रैफिक के लिए बनी सड़कों के फ्लाई ओवरों पर साइकिल रिक्शा या रेहड़ी का बीच में ही अटक जाना व उसके पीछे आटोमोबाइल वाहनों का रेंगना सड़क के साथ-साथ ईंधन की भी बर्बादी करता है, लेकिन इसकी देखभाल के लिए कोई नहीं है। कुल मिलाकर हमारी सोच बेहद थोथी है। दिल्ली से ग्रेटर नोएडा के बीच सरपट रोड के दोनों ओर अब मकान और दुकान ही दिखने लगे हैं। ग्रेटर नोएडा से आगरा के बीच ताज एक्सप्रेस-वे पर पांच नए शहर बसाने के लिए बड़े-बड़े प्राइवेट बिल्डरों को ठेका दिया जा रहा है। जाहिर है कि यहां की संभावित लाखों-लाख आबादी अपने दैनिक उपयोग के लिए इसी एक्सप्रेस-वे का इस्तेमाल करेगी। इस पर इक्का-तांगा भी चलेंगे और साइकिल और रिक्शा भी। जाहिर है कि इस सड़क की हालत बहुत-कुछ राजधानी दिल्ली की आउटर रिंग रोड की तरह हो जाएगी। भले ही पाकिस्तान की वित्तीय व प्रशासनिक स्थिति हमसे दोयम हो, लेकिन वहां यूरोप-अमेरिका की तर्ज पर हाईवे पर चप्पे-चप्पे पर कैमरे लगे हैं। हाईवे पर कम स्पीड के वाहन चलने पर पाबंदी है और बेतरतीब गाड़ी पार्क करने का मतलब तत्काल भारी जुर्माना है। सड़कों की दुर्गति में हमारे देश का उत्सव-धर्मी चरित्र भी कम दोषी नहीं है। घर में शादी हो या भगवान की पूजा, किसी राजनैतिक दल का जलसा हो या मुफ्त लगा लंगर, सड़क के बीचों-बीच टैंट लगाने में कोई संकोच नहीं होता है। टैंट लगाने के लिए सड़कों पर छेद करे जाते हैं । उत्सव समाप्त होने पर इन्हें बंद करना अपनी शान में गुस्ताखी माना जाता है। इनमें पानी भरता है और सड़क गहरे तक कटती चली जाती है। कुछ दिनों बाद कटी-फटी सड़क के लिए सरकार को कोसने वालों में वे भी शामिल होते हैं, जिनके कुकर्मो का खामियाजा सड़क को उठाना पड़ रहा होता है। नल, टेलीफोन, सीवर, गैस पाइपलाइन जैसे कामों के लिए सरकारी महकमे भी सड़क को चीरने में कतई दया नहीं दिखाते हैं। सरकारी कानून के मुताबिक इस तरह सड़क को नुकसान पहुंचाने से पहले संबंधित महकमा स्थानीय प्रशासन के पास सड़क की मरम्मत के लिए पैसा जमा करवाता है, लेकिन सड़कों की दुर्गति यथावत रहती है।ड्ढr वैसे तो यह समाज व सरकार दोनों की साझा जिम्मेदारी है कि सड़क को साफ, सुंदर और सपाट रखा जाए, लेकिन हालात देख कर लगता है कि कड़े कानूनों के बगैर यह संस्कार आने से रहे।ड्ढr ं

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  • Web Title: इन्फ्रास्ट्रक्चर : कौन सिखाएगा सड़क संस्कार