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वार्ता का सिलसिला

पाकिस्तान में अंदरूनी संकट के चलते भारत के साथ शांति प्रक्रिया धीमी पड़ गई थी। अब भारतीय विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी की इस्लामाबाद-यात्रा में यह सिलसिला आगे बढ़ाने की कोशिश होगी, और यह एक सकारात्मक घटनाक्रम है कि दोनों देश मतभेदों के हल की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। पाक में नई सरकार के गठन के बाद भारत पहली बार कंपोजिट डॉयलॉग पर चौथे दौर की वार्ता में भाग लेगा और मुखर्जी को नए सत्ताधारी नेताओं के नजरिए को समझने-परखने का मौका मिलेगा। कुछ दिन पहले वास्तविक नियंत्रण रखा पर भारतीय सीमा में हुई गोलीबारी में अपने हाथ से इनकार के बाद पाक ने उसकी जांच कराने पर सहमति जाहिर कर सकारात्मक संकेत दिया है कि वह वार्ता पर इस गोलीबारी की काली छाया पड़ने नहीं देना चाहता। फिर भी मुखर्जी की यात्रा से ठोस नतीजों की आशा प्रतीत नहीं होती। इसके कई कारण हैं। पहला, जयपुर में आतंकी विस्फोटों ने वार्ता का माहौल खराब किया है और इसको लेकर आतंकवाद के बार में भारत द्वारा चर्चा पर जोर देना लाजिमी है। पहले दोनों देशों ने आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त तंत्र बनाया था, जिसको लेकर पाक रवैए ने अपेक्षित भरोसा पैदा नहीं किया है। इसलिए, आतंकवाद के खिलाफ दोनों देश जुबानी जमाखर्च से आगे बढ़ें, तभी सार्थक नतीजा माना जा सकता है, जिसकी उम्मीद कम है। दूसरा, कश्मीर मसले पर नई पाक सरकार की कोई स्पष्ट नीति सामने नहीं आई है, बल्कि उसके नेताओं के बयान भ्रम ही पैदा करते हैं। पीपीपी प्रमुख जरदारी ने भारत के साथ मधुर रिश्तों की खातिर कश्मीर मसले को कुछ समय के लिए भुलाने की बात कही थी और गठबंधन सरकार के अन्य घटक पीएमएल प्रमुख शरीफ ने भी इसी आशय की राय जाहिर की, पर उन्हीं के विदेशमंत्री कुरैशी ने अब कश्मीर को मूल मसला बताते हुए कहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के मुताबिक उसका हल होना चाहिए, जबकि बहुत समय पहले संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव कोफी अन्नान तक इस प्रस्ताव को अप्रासंगिक बता चुके थे। तीसरा, पाक सरकार अभी अफगान सीमा पर अपने क्षेत्र में विद्रोह और आतंक की ज्वाला में उलझी हुई है। इसके मद्देनजर वह भारत के साथ ऐसा कोई स्पष्ट कदम उठाने से हिचकेगी, जिससे उसे असंतोष का जोखिम झेलना पड़े। फिर भी, वार्ता का सिलसिला जारी रहने को कमतर नहीं आंका जा सकता।

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  • Web Title: वार्ता का सिलसिला