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मायूसी और हकीकत के साठ साल

इस्रइल अपनी साठवीं सालगिरह मना रहा है और मुसलमानों के सीने पर सांप लोट रहा है। मुसलमानों को इस्रइल का वजूद बर्दाश्त नहीं, लकिन अब वह साठ साल की तल्ख हकीकत के रूप में मौजूद है। वहां बसने वाले एक करोड़ तीस लाख अरब मुसलमान इस्रइल की साठवीं सालगिरह के जश्न में शरीक नहीं हो रहे हैं। दस साल पहले इस्रइल के पचास साल पूरे होन के समारोह में हिंसक झड़पें हुई थीं। अपने घरों से बेघर कर दिए गए अरब मुसलमानों का सबसे बड़ा दुख है कि उन्हें अपनी ही ज़मीन पर रहने-बसन की इजाज़त नहीं। उस जगह जहां वे पैदा हुए थे। उस घर में जहाँ उन्होंने पहली सांस ली थी। उस जगह जो उनके पुरखों की थी। जन्मभूमि के सार हक उनसे जबरन छीन लिए गए। शरणार्थी शिविरों में रह कुछ बूढ़े अरब मुसलमान हरे भरे-बड़े हो गए उन दरख़्तों की तरफ हसरत भरी निगाह से देखते हैं, जिनका पौधा उन्होंने अपने बचपन में बोया था। इन दरख्तों के फल यहूदियों के हो चुके हैं। यह पूरा इलाका 1850 में करीब चार लाख अरब मुसलमानों का था। 75 हज़ार ईसाई और 25 हज़ार यहूदी भी यहां रहते थे। हज़ारों साल से ये सब अपनी इसी दुनिया में खुशी-खुशी के साथ रहते आए थे। उन्नीसवीं सदी के आखिर में यूरोप में यहूदियों के उग्रवादी संगठनों के ज़रिये यहूदी ‘होमलैंड’ की खोज शुरू हुई। पहले अफ्रीका के कुछ हिस्सों में, फिर दक्षिण अमेरिका और अंत में फिलिस्तीन को चुना गया यहूदी जन्म स्थली के लिए। यह वह जगह थी जहां अतीत में कभी हिब्रू समाज हुआ करता था, लेकिन समय के थपेड़ों से बिखर गया यह संसार तब तक अतीत की एक धुंधली याद भर रह गया था। यहूदी अपनी मज़हबी आस्था के मुताबिक इस सरामीं पर लौटने की पूरी प्रक्रिया को ‘पुनर्जन्म’ मानते हैं। सन सैंतालीस, वही जो हिन्दुस्तान के विभाजन का साल था। उसी वर्ष 2नवम्बर को अमेरिकी यहूदियों के दबाव में संयुक्त राष्ट्र ने दो राष्ट्र सिद्धान्त के तहत फिलिस्तीन का पचपन फीसदी हिस्सा यहूदी होमलैंड के लिए निर्धारित कर दिया। उस वक्त जबकि वहां यहूदियों की तादाद कुल आबादी की सिर्फ 30 फीसदी थी और उनके पास फिलिस्तीन का सात प्रतिशत भूभाग था। अरब लीग ने इस प्रस्ताव का विरोध किया, लकिन सुनता कौन, और 14 मई 1ो इस्रइल ने एक स्वतंत्र देश होने की घोषणा भी कर दी। दुनिया के नक्शे पर अचानक ही एक नया मुल्क उभर आया तो ऐसे में बहुत से लोगों के पास जंग के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। नब्बे हज़ार यूरोप ट्रेंड सैनिकों ने अत्याधुनिक तकनीक और हथियारों से लैस होकर तीस हज़ार अरब फौज को धूल चटा दी। अरबों के पास न नई तकनीक थी और न अत्याधुनिक हथियार। कोई मुकाबला ही नहीं था। नतीजा, जंग खत्म होते-होते फिलिस्तीन के 78 प्रतिशत भूभाग पर ‘इस्रइल’ का जन्म हो चुका था। संयुक्त राष्ट्र के जरिये निर्धारित की हुई ज़मीन से ज्यादा। इस इलाके के करीब चार सौ शहर-गांव तबाह हो चुके थे। नया नक्शा तैयार हो रहा था जिसमें हर नदी, नहर, शहर और नाल का यहूदियों की भाषा हिब्रू में नाम रखा जा रहा था। सन् 1में इस्रइल ने एक बार फिर फिलिस्तीनियों पर हमला बोला और गाज़ा और पश्चिमी तट सहित सीरिया और मिस्र् के कुछ हिस्सों पर भी कब्ज़ा कर लिया। मिस्र् की ज़मीन तो उसने लौटा दी, पर सीरिया की नहीं। तब से फिलिस्तीनी शरणार्थी अपने छीन लिए गए वतन की वापसी की आस भरी जद्दोजहद में मुब्तला हैं। जो इस्रइल में हैं उनकी हालत बहुत बुरी है। गरीबी, भेदभाव और अभाव उनका मुकद्दर बन चुका है।ड्ढr हाल ही में एक यहूदी रब्बी ने फतवा जारी कर दिया कि अरब मुसलमानों को यहूदी न नौकरी दें और न किराये पर मकान। अब ज्यादातर यहूदी चाहते हैं कि मुसलमान इस्रइल से बाहर चले जाएं। हालांकि इस्रइल ने अपने आपको लोकतांत्रिक देश घोषित कर रखा हैं। अब एफर्मेटिव एक्शन के तहत शिक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को शामिल करने पर सरकार विचार कर रही है। इस्रइल के प्रधानमंत्री कार्यालय के महानिदेशक रानन दीनर के मुताबिक ‘हमें मालूम है कि उन्हें और जमीन की जरूरत है, उनके बच्चों के रहन के लिए भी जगह चाहिए।’ उनके मुताबिक इस्रइल जल्दी ही भेदभाव खत्म करेगा। उत्तर में एक नया अरब शहर बनाया जाएगा। इस्रइल तो देश बन गया पर जिन अरब मुसलमानों की यह जगह थी वह अभी भी अपने मुल्क के लिए तरस रहे हैं।ड्ढr अरब मुसलमानों का जो छीन लिया गया, वह वापस नहीं होगा। इस्रइल की सरकार ने 1में मुसलमानों से छीनी गई एक लाख बीस हज़ार हेक्टेयर ज़मीन को सरकारी सम्पत्ति घोषित कर दिया। फिलिस्तीनी शरणार्थी कैम्पों को भी इस्रइल की दया पर निर्भर रहना पड़ता है जब-तब इनकी बिजली काट दी जाती है। पानी बंद कर दिया जाता है। जहाँ दो सौ लोग रह सकते हैं वहां पांच सौ को रहने पर मजबूर किया हुआ है। ये सब लोग बाहरी राहत सामग्री और सहायता पर जीवित हैं। जो मुसलमान इस्रइल की बना दी गई सरहद के अंदर हैं, उनका भी बुरा हाल है।ड्ढr एक गरीब यहूदी के मुकाबले अरब की गरीबी तीन गुना ज्यादा है। वह भी उस इस्रइल में जो लगातार तरक्की कर रहा है। जो हर क्षेत्र में आस-पास के देशों से बहुत आगे बढ़ गया है।ड्ढr इस्रइल बन जाने से दुनिया भर में फैले यहूदियों की बेवतनी खत्म हुई। सब अपने वतन लौटे। भारत में 10 तक करीब तीस हज़ार यहूदी थे, अब पाँच हज़ार भी नहीं हैं। सब इस्रइल चले गए। अब इस्रइल में करीब पाँच करोड़ यहूदी बसते हैं, 1से पहले पौन करोड़ भी नही थे। जिनकी ज़मीन को यहूदियों ने जबर्दस्ती ताकत के बल पर अपना वतन घोषित कर दिया, उनके लिए साठड्ढr साल आज़ादी के नहीं मायूसी, घुटन और हारी हुई जिंदगी के साठ साल हैं। वेड्ढr वैसे शरीक हो सकते हैं अपने लुटेरों के जश्न में। इस्रइल की हर खुशी मुसलमानों के सीने पर बरछी चलाती है। मुसलमानों ने सिर्फ एक मुल्क ही नहीं खोया यरूशलम के उस पवित्र स्थान पर भी इस्रइल न कब्ज़ा कर लिया जिसे ‘किब्ला-ए-अव्वल’ कहा जाता है। काब के रुख की तरफ सिजदा कर नमाज़ पढ़ने से पहले इसी मस्जिदे-अक्सा की तरफ रुख करके नमाज़ पढ़ी जाती थी, इसलिए मस्जिदे अक्सा को किब्ला-ए-अव्वल का दर्जा हासिल है।

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