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गुरु गोबिंद सिंह को देखने का नया अंदाज

अरसे बाद कुछ कलाकारों ने अपनी कल्पना से उनके पोर्ट्रेट बनाए। बाद के पेंटरों या मूर्तिकारों ने उन्हीं को आधार बना कर अपना काम किया। आज भी यही सब हो रहा है। अब ये स्टीरियोटाइप हो गए हैं। अभी एक दिन श्रीमती हराीत चरनजीत सिंह सुबह-सुबह ही चली आईं। वह बेहद उत्साहित थीं। उन्होंने बताया कि कलाकार सरनजीत सिंह ने गुरु गोबिंद सिंह का खूबसूरत आदमकद पोट्र्रेट बनाया है। मैं उनकी भावनाओं को समझ सकता था। आखिर वे पक्की सिखणी हैं। अपने होटल ली मेरीडियन आने से पहले वे मत्था टेकने गुरुद्वारा बंगला साहिब जाती हैं। चहकते हुए उन्होंने कहा, ‘वह पोर्ट्रेट बिल्कुल अलग है। उन्होंने गुरु गोबिंद सिंह को एक योद्धा की तरह पेंट नहीं किया है, जसा कि ज्यादातर लोग करते हैं। उन्होंने गुरु साहिब को एक विद्वान और कवि की तरह पेश किया है। यह सही है कि गुरु गोिबद सिंह को हमेशा घोड़े पर सवार दिखाया गया है। एक हाथ में बाज और दूसर में तलवार होती है। लोग धीर-धीर भूल गए कि वह पंजाबी, फारसी, ब्रज और संस्कृत के जानकार भी थे। ‘ाफरनामा’ में एक चिट्ठी के जरिए वह बताते हैं कि क्यों उन्हें मजबूरन हथियार उठाने पड़े।ड्ढr चू कर अज हमा, हर हील ते दरगुजश्तड्ढr हलाल अस्त बर्दा बा शमशीर दस्त।।ड्ढr जब मैंने हर कोशिश कर ली। जब कोई कामयाबी नहीं मिली। तब मुझे मजबूरी में तलवार निकाल लेनी पड़ी।ड्ढr फिराक गोरखपुरी ने उस पर कमाल का लिखा है-ड्ढr ख्वाब को जज्बाई बेदार दिए देता हूं।ड्ढr कौम के लिए हाथ में तलवार दिए देता हूं।ड्ढr गुरु गोबिंद सिंह ने वीर रस की कविताओं के अलावा भी लिखा है। कुछ को पढ़ कर तो आंखें भर आती हैं। वे कुल 42 साल के थे, जब उनकी हत्या हुई। हराीत ने दिल्ली के मशहूर सिखों को बुलाया था। दरअसल, पैसेवाले सरदार तो अपने संगमरमरी बंगलों और लिमूजिन्स के लिए जाने जाते हैं। किताब और पेंटिंग से उन्हें कोई खास मतलब नहीं रहता। मैं परेशान था कि बेचार सरनजीत की पेंटिंग कोई खरीदेगा भी या नहीं। फिर उनकी पेंटिंग्स हाारों में नहीं लाखों में थीं, लेकिन मुझे हैरानी हुई कि उनकी सभी पेंटिंग बिक गईं।ड्ढr मजाा लखनवीड्ढr प्रोफेसर मुजीब अक्सर मेर यहां चले आते थे। वेामिया मिल्लिया के वाइस चांसलर रहे थे । उनके साथ वक्त गुजारना एक अनुभव था। वह अंग्रेजी, उर्दू और जर्मन के जानकार थे। उन्हें उर्दू शेर-ओ-शायरी से लगाव था। उनके पसंदीदा शायर मजाा थे, लेकिन मैंने मजाा को पढ़ा नहीं था। मजाा पर उन्हीं की सुनाई कुछ चीजें मैंने अपनी नोटबुक में लिख रखी हैं, लेकिन मुजीब के जाने के बाद मैंने उनका कुछ नहीं पढ़ा। हाल ही में मुझे एक और मजाा के फैन मिले। वह शख्स ए.आर. किदवई हैं। हरियाणा के राज्यपाल। वह मुजीब की तरह गा तो नहीं सकते, लेकिन पढ़ते खूब हैं। उन्होंने उर्दू में मजाा पर हाल ही में लिखी एक किताब मुझे ोजी। उसे मजाा की भतीजी सेहबा अली ने लिखा है। अब तक मैं यही समझता था कि मजाा साहब जम कर पीते थे। कुछ वक्त उन्होंने रांची के अस्पताल में इलाज भी कराया था, लेकिन उससे कुछ नहीं हुआ। 1में उनका इंतकाल हो गया। असरार उल हक मजाा ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के दिनों में शायरी लिखना शुरू किया था। बहुत जल्द ही वे मशहूर हो गए। उनकी ‘नार- ए-अलीगढ़’ वहां के स्टूडेंट यूनियन का तराना हो गया था। यूनिवर्सिटी की पढ़ाई के बाद वे ऑल इंडिया रडियो चले गए। अली सरदार जाफरी के साथ उन्होंने ‘नया अदब’ निकाला था। उनकी सबसे मशहूर नज्म ‘आवारा’ है-ड्ढr शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूं।ड्ढr जगमगाती जागती सड़कों पर आवारा फिरूं।।ड्ढr गैर की बस्ती है कब तक दरबदर मारा फिरूं।ड्ढr ऐ गमे दिल क्या करूं? ऐ वहशत ए दिल क्या करूं।।ड्ढr मजाा विद्रोही थे। वह औरतों के बदतर हालात से दुखी थे। वह चाहते थे कि वे बुरका न पहनें। मुझे हैरत है देवबंद उलेमाओं ने उनके खिलाफ कोई फतवा जारी नहीं किया। सेहबा ने बेहतर काम किया है। उसे अंग्रेजी में भी लाना चाहिए।ं

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