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बृज बिहारी हत्याकांड के नौ दोषी बरी

विधि संवाददाता पटना। पटना हाईकोर्ट ने पूर्व मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की हत्या के सभी दोषी को बरी करते हुए रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने अपने 278 पन्ने के फैसले में यह आदेश सुनाया। न्यायमूर्ति इकबाल अहमद अंसारी तथा न्यायमूर्ति वीएन सिन्हा की खंडपीठ ने इस कांड के सभी नौ दोषियों की ओर से दायर आपराधिक अपील पर सुनवाई के बाद अपने सुरक्षित आदेश को सुनाया।

पूर्वी चंपारण के भवानीपुर जिरात निवासी अमरेंद्र कुमार सिन्हा के बयान पर गर्दनीबाग थाना कांड संख्या 336/98 दर्ज किया गया था। इसमें कहा गया कि वह 3 जून, 1998 को इलाज के लिए भर्ती विधायक बृज बिहारी प्रसाद से मिलने आईजीआईएमएस गए थे।

रात सवा आठ बजे वह विधायक के साथ आईजीआईएमएस के कार पार्क में टहलने आए। इनके साथ कारबाइनधारी गार्ड के साथ 2-4 सिपाही राइफल ले चल रहे थे। साथ में कमांडो पार्टी भी थी। बजरंगी बली का नारा लगाकर भागे हमलावर इसी बीच वहां सूमो तथा एम्बेसडर गाड़ी आई।

गाड़ी से भूपेंद्र नाथ दूबे, मंटू तिवारी, मुन्ना शुक्ला, श्रीप्रकाश शुक्ला, राजन तिवारी, सतीश पांडेय के अलावा 3-4 अज्ञात व्यक्ति उतरे तथा एकाएक विधायक एवं बाॠडीगार्ड के पास आ गए। भूपेंद्र नाथ दूबे ने विधायक को गोली मारने की बात कहते हुए अपनी पिस्तौल से फायर कर दिया।

मंटू तिवारी स्टेनगन से गोली चलाने लगा। श्रीप्रकाश शुक्ला ने पिस्तौल से गोली चलाई। अंधाधुंध फायरिंग से विधायक एवं बाॠडीगार्ड लक्ष्मीश्वर साह गिर पड़े। इसके बाद सभी हमलावर बजरंग बली का नारा लगाते हुए गार्ड की कारबाइन लेकर सूमो व एम्बेसडर में बैठकर भाग गए।

अस्पताल परिसर में लगी ट्यूब लाइट की रोशनी में सभी को पहचानने का दावा सूचक ने किया। अमरेंद्र कुमार के मुताबिक दोनों की मौके पर ही मौत हो गई। तीन अक्टूबर, 1998 को आरोप पत्र दायर फर्द बयान के आधार पर गर्दनीबाग (शास्त्री नगर) थाने में कांड संख्या 336/98 दर्ज किया गया तथा जांच तत्कालीन थाना प्रभारी एसएसपी यादव को सौंपी गई। बाद में एसएसपी के आदेश से कांड की जांच तथा सभी कागजात सचिवालय थाने के आरक्षी उपाधीक्षक शशि भूषण शर्मा को सौंप दिए गए।

पुलिस ने अभियुक्त सूरज भान सिंह, राम निरंजन चौधरी, सुनील सिंह के खिलाफ तीन अक्टूबर,1998 को आरोप पत्र दायर किया, जबकि श्रीप्रकाश शुक्ला, अशोक सिंह, अनुज प्रताप सिंह, सुधीर, भूपेंद्र नाथ दूबे, मुन्ना शुक्ला, सतीश पांडेय, रामाशीष पांडेय, राजन तिवारी, ललन सिंह, नागा उर्फ ब्रजेश, मुकेश सिंह, कैप्टन सुनील सिंह को फरार घोषित किया।

इसी बीच श्रीप्रकाश शुक्ला, अनुज प्रताप सिंह, सुधीर त्रिपाठी, भूपेंद्र नाथ दूबे और सुनील सिंह की हत्या हो गई। 07 अप्रैल को सीबीआई को जांच की जिम्मेदारी बिहार सरकार के अनुरोध पर मामले की जांच का जिम्मा सीबीआई को अधिसूचना 228/16/99 एभीडी-2 दिनांक 07 अप्रैल, 1999 से सौंपी गई।

सीबीआई ने आरसी 4(एस)1999 अंकित कर डिप्टी एपी आरएस खत्री को सौंपा गया। सीबीआई ने शशि कुमार राय के खिलाफ 8 नवंबर को आरोप पत्र दायर किया। 20 अप्रैल, 2001 को रघुनाथ पांडेय के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया, बाद में उनकी मृत्यु हो गई। 12 अगस्त 2009 को सभी को सुनाई गई सजा 2004 में आरोप गठन किया गया तथा 23 अगस्त 2005 से गवाही शुरू की गई। 50 गवाहों के नाम दिए गए, जिसमें 34 की गवाही कोर्ट में कराई गई।

लंबी गवाही एवं सुनवाई के बाद अपर सत्र न्यायाधीश तृतीय विजय प्रकाश मिश्र ने 12 अगस्त, 2009 को राम निरंजन चौधरी, शशि कुमार राय, ललन सिंह, विजय कुमार शुक्ला उर्फ मुन्ना शुक्ला, राजन तिवारी, मंटू तिवारी, सूरज भान सिंह उर्फ सूरज सिंह उर्फ सूरजा, मुकेश सिंह, कैप्टन सुनील सिंह को दोषी करार देते हुए उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में लेने का आदेश तथा आजीवन कारावास व अर्थदंड की सजा दी। हाईकोर्ट में दायर कर चुनौती दी गई निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में अपील दायर कर चुनौती दी गई।

आवेदकों की ओर से वरीय अधिवक्ता सुरेंद्र सिंह, अखिलेश्वर प्रसाद सिंह, वाईवी गिरी, कन्हैया प्रसाद सिंह, अजय कुमार ठाकुर सहित राजकुमार ने पक्ष रखा। सीबीआई की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरीय अधिवक्ता सिद्धार्थ लुथरा तथा विपिन कुमार सिन्हा ने पक्ष रखा।

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