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महिला आरक्षण - उर्फ असिल कथा पांचाली-नाटकम

बारह बरस बाद तो घूर के दिन भी फिर जाते हैं, अत: महिला आरक्षण के समर्थकों में एक क्षीण उम्मीद बनी हुई थी कि इस बजट सत्र के खत्म होने से पहले बारह बरस से अधर में टंगा यह विधेयक शायद संसद में पैठ पा जाएगा। उम्मीद पूरी हुई और विरोधियों की तमाम व्यूह रचनाओं को ोदते हुए विधेयक राज्यसभा के पटल पर रखा ही नहीं गया, इसे एक विशेष स्थायी समिति को सुपुर्द भी कर दिया गया। बहरहाल विधेयक को (राज्यसभा सभापति के आगे औपचारिक रूप से पटल पर रखने की कार्यवाही के दौरान) सपा, जदयू और राजद के सदस्यों की आक्रामक प्रतिक्रिया देखने के बाद महिलाओं तथा विधेयक समर्थकों के मन में अगली लोकसभा शुरू होते ही इस बिल के सर्वानुमति से तुरत-फुरत पारित हो जाने की खास उम्मीद नहीं बची होगी। महिला सशक्तिकरण का नारा उठा कर खुद अपनी पत्नी को बिहार का (अब तक का सबसे विवादास्पद) मुख्यमंत्री बनवाने वाले लालू यादव ने भी शुरुआती हिचकिचाहट भर मौन के बाद बिल के खिलाफ कमर कस ली है और उनकी पार्टी की ओर से (बिल की छानबीन को गठित) संसदीय समिति के लिए विधेयक के सबसे कटु और मुखर आलोचकों में से एक देवेन्द्र प्रसाद यादव को नामजद कर दिया गया है, जिनके अनुसार यह बिल लोकतंत्र के लिए विवादित भारत-अमरीका परमाणु डील से भी बड़ा खतरा है। जद (यू), सपा और राजद के अलावा आरक्षण से लाभान्वित होते रहे अन्य धड़े, दलित तथा अल्पसंख्यक भी लामबंद हैं कि उनकी महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण के भीतर (पूर्वप्राप्त आरक्षण के अलावा) हिस्सा भी मिले। जाहिर है यह विधेयक अगली संसद में भी मुखर और कड़वे कलह का केन्द्र होगा, लेकिन इन बादलों के चारों ओर एक स्वर्णिम रखा है और वह है महिला सांसदों द्वारा दलगत ोदभाव पर फेंक कर बिल के पक्ष में एक ठोस मोर्चाबंदी बनाना। वामदलों की सबल नेत्री वृन्दा करात का दक्षिणपंथी भाजपा की सुषमा स्वराज का हाथ थाम कर बिल के संसद के पटल पर रखे जाने पर एक साथ हर्ष व्यक्त करना बिल समर्थकों के आत्मविश्वास और एकाुटता का परिचायक है। यही मानसिकता बनी रही, तो देर-सबेर यह विधेयक कानून भी बन ही जाएगा।ड्ढr अब आते हैं बिल के विरोध में दिए जा रहे तर्को पर। इनमें से पहला और सबसे बड़ा तर्क यही है कि अगर बिल पारित हो भी गया तो इससे सबसे ज्यादा फायदा पढ़ी-लिखी शहरी मध्यवर्गीय स्त्रियों को मिलेगा, बहुसंख्यक अनपढ़ या अर्धसाक्षर ग्रामीणाओं को नहीं। यही धड़ा पंचायती राज में आरक्षण की मार्फत आ चुकी 10 लाख निरक्षर या अर्धसाक्षर ग्रामीण महिला पंचों की कार्यक्षमता पर भी बड़े-बड़े सवालिया निशान लगाता रहा है। परकटी शहरातिनें भी नाकाबिल और घूंघटवाली ग्रामीणाएं भी। यानी चित भी मेरी और पट भी मेरी और अंटा बाप-दादों (पोतों-परपोतों) का। हमारी संसद में महिलाओं का आंकड़ा आज भी दस प्रतिशत से कम है, लेकिन उनमें सोनिया, मायावती, वसुंधरा राजे, सुषमा स्वराज, वृन्दा करात और रणुका चौधरी सरीखी सक्षम, सम्मानित और पढ़ी-लिखी शहरी महिलाओं के पीछे संसद में मुखर भागीदारी और महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और विधायिका से लेकर कॉर्पोरट जगत तक में उचित प्रतिनिधित्व पर सदन के भीतर और बाहर लड़ी गई सार्थक लड़ाइयों तथा बहसों का एक लंबा-उाला इतिहास भी है। अगर उनमें से कुछ इस कारण राजनीति में आईं कि यह उनके परिवारों की परंपरा रही है, तो इसमें धूल में लोट-लोट कर उन्हें कोसने जसा क्या है। क्या हमारी संसद और विधायिका में पारिवारिक पृष्ठभूमि और वंश विशेष से जुड़ कर राजनीति में आए अनेक अर्धसाक्षर बेटों, दामादों, भाइयों यहां तक कि सालों की तादाद उनसे कहीं अधिक नहीं? जहां तक सुशिक्षित होने की बात है, तो हमारी विधायिका, जो देश के लिए उच्चतम स्तरों पर नीति और कानून गढ़ती है, अधिकाधिक सुशिक्षित शिष्ट सदस्यों वाली बने इसमें आपत्तिजनक क्या है?ड्ढr दूसरा और अपेक्षया अधिक गंभीर तर्क इस बिल के विरोध में यह दिया जा रहा है, कि भारत में इंदिरा गांधी से सोनिया गांधी तक शीर्ष महिला लीडरान के लंबे कार्यकाल रहे हैं, लेकिन फिर भी महिलाओं की स्थिति बदहाल है। यू.एन. की जेण्डर ोदभाव तालिका में हम आज भी (बांग्लादेश तथा कई अफ्रीकी देशों से नीचे, 114वीं पायदान पर खड़े हैं। इस तर्क को सर के बल खड़ा करं। अगर इंदिरा गांधी ने 17 बरस सरकार का नेतृत्व किया और सोनिया नीत संप्रग ने 5 बरस तक, तो भी इन बाईस बरसों को छोड़कर शेष 3बरस, यानी करीब चार दशकों तक तो कमान पुरुषों के ही हाथ में थी। पुरुषों की उनतालीस साल की अकर्मण्यता से नजरं कैसे फिरा ली जाएं? जो कुछ लोग स्त्रियों के हितार्थ बहुविवाह, बलात्कार, महिलाओं के अभद्र चित्रण, वेश्यावृत्ति, कन्या भ्रूण हत्या और दहेा प्रथा के खिलाफ सख्त कानूनों के बनने और पारित होने का पूरा श्रेय पुरुष प्रधान विधायिका को देकर महिलाओं की बड़ी भागीदारी गैर-ारूरी बता रहे हैं, उन्हें इन कानूनों का वह हश्र भी देखना चाहिए, जो पुरुषप्रधान कानून- प्रशासन मशीनरी की निष्क्रियता (और कई बार मिलीभगत) से संभव होता रहा है। हमार कितने विधायकों-सांसदों के खिलाफ बलात्कार, पारिवारिक हिंसा, दहेा उत्पीड़न के मामले दर्ज हैं, यह किसी से नहीं छुपा। जिन्होंने खुद बहुविवाह कानून को धता बता कर खुलेआम एकाधिक विवाह किए हैं, परिवार नियोजन की धज्जियां उड़ा कर दर्जनों बच्चे पैदा किए और बेटे-बेटियों की तामझामभरी शादियों में जम कर दहेा लिया और दिया है, वे भी महिला-बिल की आलोचना करें, इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी?ड्ढr तीसरा बड़ा तर्क इन दिनों यह पेश किया जा रहा है, यह है कि सच्चा महिला सशक्ितकरण तो अंतत: आर्थिक तरक्की से ही संभव है। मुक्त अर्थनीति और भूमण्डलीकरण के दौर में महिलाएं खामख्वाह चुनावी रस में क्यों घुसें? जल्द ही वे भी आर्थिक रूप से स्वाश्रयी-समृद्ध नागरिक बन जाएंगी तो उनका क्या नाम कहते हैं, सशक्तिकरण वगैरा भी हो जाएगा। थैंक्यू सर जी । यदि यह सच होता तो अनिल अंबानी और विजय माल्या से लेकर नवीन जिन्दल तथा सुब्बीरामी रड्डी तक देश के शीर्ष कॉर्पोरटोार भला क्यों तमाम कष्ट (तथा खर्चा-पानी) उठा कर विधायिका में प्रवेश करने को यूं कुरलाते? आरक्षण के क्षेत्र में सुई की नोक बराबर जमीन महिलाओं के साथ बांटने के विरोधी तो अपनी जातियों की महिलाओं की बराबरी की संभावना से भी बेहद सशंक हैं क्योंकि उनकी लड़ाई समता नहीं विषमतामूलक है।ड्ढr डॉ. लोहिया एक मजेदार प्रसंग सुनाया करते थे कि शरशैया पर पड़े भीष्म जब लगातार अट्ठारह दिनों तक कौरव-पाण्डवों को नैतिक प्रवचन देते रहे, तो अंत में द्रौपदी की हंसी छूट गई। भीम अशिष्ट पत्नी को मारने लपके पर युधिष्ठिर ने रोक कर कहा, पांचाली अकारण नहीं हंसती। कोई वजह जरूर होगी। पांचाली से पूछा गया तो उसका उत्तर था—‘‘पूज्य पितामह से इतने गंभीर नैतिक प्रवचन सुन रही हूं। मन में सहा ही आया, जब इनकी पौत्रवधू, मैं, कौरव सभा में बालों से घसीट कर लाई गई और विवस्त्र की गई, तो भला उस वक्त यह तमाम ज्ञान कहां जाकर घुस गया था?’’ ं

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