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हमसे हिसाब माँगने लगा है पानी

यह अपने घर के सामने का किस्सा है। 1में पानी की काफी किल्लत होने लगी थी। ऊपर तक दौड़-भाग की गई तो एलडीए ने कॉलोनी के लिए ट्यूबवेल मंजूर कर दिया। जल निगम ने 110 फुट गहरी बोरिंग करके ट्यूबवेल लगा दिया। पानी की किल्लत खत्म हो गई। बल्कि इफरात से पार्को की सिंचाई भी होने लगी। सन् 2008 की शुरुआत में फिर पानी की कमी होनी लगी। पता चला ट्यूबवेल ठीक से पानी नहीं खींच पा रहा। उसे फौरन 10 फुट और गहरा किया गया। इसी मई मास में एक दिन अचानक जल निगम की भारी-भरकम मशीनें पुराने ट्यूबवेल के बगल में ड्रिलिंग करने लगीं। पता चला नया ट्यूबवेल खोदा जा रहा है क्योंकि पहले वाला किसी भी समय ठप होने वाला है। नए ट्यूबवेल की गहराई 170-180 फुट होगी- जहाँ ठीक-ठाक पानी मिल जाए। हमारी कॉलोनी में जमीन के नीचे पानी का स्तर 1से 2008 के बीच कम से कम 60 फुट गिर गया!ड्ढr पानी की समस्या का हल करना जरूरी है और ट्यूबवेल सबसे आसान तरीका लगता है। खोदा और भरभराकर पानी आने लगा। जहाँ देखिए वहाँ ट्यूबवेल। लोग अपने घरों में भी ट्यूबवेल जैसी गहरी बोरिंग करवाकर पानी की मौज कर रहे हैं। 1में जब हमारी कॉलोनी में ट्यूबवेल लगा तब भी वह मानकों के विपरीत था क्योंकि 200 मीटर के दायर में दूसरा ट्यूबवेल पहले से धरती का पानी उलीचने में जुटा था। हमने इसका उल्लेख किया था तो शुभ चिंतक अफसरों ने टोका था- ‘अर भाई, आपको पानी चाहिए न!’ हमें तब से खूब पानी मिला। आगे भी मिलेगा, नया और गहरा ट्यूबवेल जो लग रहा है! लेकिन कब तक? पुराना ट्यूबवेल तेरह वर्ष चला। नया वाला कितने साल चल पाएगा?ड्ढr किसी भी समस्या का तात्कालिक समाधान कर उसके दीर्घकालीन नतीजों से आँख मँूद लेना हमारी प्रवृत्ति बन गई है और पानी के मामले में यह बहुत ही खतरनाक होने जा रही है। साफ संकेत कभी से मिलने लगे हैं। हैण्डपम्प बेकार हो गए। ट्यूबवेल फेल हो रहे हैं। नदियाँ सूख रही हैं और हर इलाके से छोटी स्थानीय नदियों के मैदान बन जाने की अफसोसनाक खबरं आती जा रही हैं। बुन्देलखण्ड का ‘सूखा’ फैलते-फैलते कई और ‘खण्डों’ तक पहँुच गया है। गर्मी तो गर्मी, जाड़ों में भी पानी के लिए त्राहि-त्राहि मचीड्ढr रहती है। लेकिन सेमिनारों- लेखों के बाहर इस चिंता का असर नहींड्ढr दिखाई देता। व्यक्ितगत से लेकर सार्वजनिक स्तर तक भूजल का अंधाधुंध दोहन जारी है। किफायत दूसरा करं, मैं क्यों करूँ! मैं तो ओहदेदार हँू- प्रभावशाली या फिर धनवान। मुझे इफरात से खर्च करने का हक है और यह तो पानी है!ड्ढr ग्रामीण समाज में पानी की कद्र आज भी खूब होती है। यह सूखे राजस्थान में ही नहीं पानी के पर्याय पहाड़ की भी रवायत रही है कि बच्चों को परात में नहलाया जाता है और परात के पानी को कई दूसर कामों में लाया जाता है। पानी का बेहतरीन प्रबन्धन हमें अपने ग्रामीण समाज में दिखाई देता है। बड़े शहरों में जहाँ तालाबों को पाटकर भू-माफिया और सरकारी अर्धसरकारी संस्थाओं ने भी बहुमंजिली इमारतें खड़ी कर ली हैं, वहीं गाँवों में आज भी जनता ने तालाबों को भरसक बचा रखा है। (देखिए- अनुपम मिश्र की किताब -आज भी खर हैं तालाब)। एक लोटा पानी से पूरा चौका कैसे धोया जा सकता है, यह ग्रामीण स्त्री से सीखिए। लेकिन पाक-कला में निपुण शहरी महिला? अंधाधुंध विकास ने शहरों को ही नहीं, हम शहरियों का मिजाज भी बिगाड़ कर रख दिया। बेहिसाब बढ़ते ये शहर गाँवों-कस्बों को निगलते जा रहे हैं। तालाबों को लील चुकी बहुमंजिली इमारतें भूजल का बेहिसाब दोहन कर रही हैं और वर्षा जल संचयन की बड़बोली बातें कागजों तक सीमित हैं। नियम-कानून हैं मगर उनको तोड़ना शान की बात समझी जाती है। यहाँ हैसियत की पहचान ही नियम- कानून तोड़ने और हेकड़ी दिखाने से होती है। जो नियम-कानून माने वह सबसे निरीह, गरीब और लाचार प्राणी होता है।ड्ढr देखिए तो बड़ी इमारतों को भूजल संचयन करने की नोटिस देने वाले ही शहरों की बची- खुची कच्ची जमीन पर टाइल्स बिछवा रहे हैं और तालाबों पर इमारतों के नक्शे पास करा रहे हैं। जहाँ से भी वर्षा के पानी के जमीन में रिसने के रास्ते थे, वे बन्द कराए जा रहे हैं। मकसद शहरों को खूबसूरत बनाना नहीं, नेताओं की फैक्िट्रयों के टाइल्स खपाना है, वर्ना सड़क किनार की कच्ची जगह पर हरी-हरी दूब भी लगाई जा सकती थी।ड्ढr गाँवों में आज भी जल-जंगल-जमीन बचाने की लड़ाई में लगे लोग मिल जाएँगे लेकिन शहरों में अफसर से लेकर नेता तक कब्जा करो अभियान में जुटा है। बिजली-पानी संकट से आजिज लोगों को भड़काकर आंदोलन कराने वाला सभासद गुपचुप तौर पर किसी तालाब को पाटकर शॉपिंग मॉल बनाने में जी जान से लगा मिलेगा या वाटर पार्क बनवाकर बेहिसाब पानी उलीच रहा होगा। दुर्भाग्य है कि राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व की चिंता में भविष्य का समाज शामिल नहीं है और सत्य यह है कि हमार बाद भी यह धरती और मानव जाति बची रहनी है। नेतृत्व यह सोच नहीं रहा और विशाल मध्य वर्ग बढ़ती चकाचौंध में आँखें ही ठीक से नहीं खोल पाता। लेकिन पानी हमसे अपना हिसाब माँगेगा। और बहुत जल्द। इसलिए सावधान!ं

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  • Web Title: हमसे हिसाब माँगने लगा है पानी