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दलित उत्पीड़न : कागजों पर घट रही संख्या

राज्य में दलितों पर हुए अत्याचार के अभी केवल 307 मामले लम्बित हैं। इसमें हत्या का एक भी मामला नहीं है। दलितों को गंभीर रूप से घायल करने का पूर राज्य में कोई मामला लम्बित नहीं है। दलित महिला के साथ बलात्कार का मात्र एक मामला लम्बित है। आपको भरोसा हुआ? राज्य सरकार को भी भरोसा नहीं हो रहा है। अनुसूचित जाति-ानजाति उत्पीड़न निवारण अधिनियम के तहत दर्ज ये आंकड़े तो बता रहे हैं कि राज्य में दलितों पर अत्याचार नहीं के बराबर हो रहे हैं और चारों तरफ मामला ठीक-ठाक है। लेकिन हकीकत कुछ और है। मामला यह है कि बिहार की पुलिस अब भी अनुसूचित जाति-ानजाति उत्पीड़न निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज ही नहीं करती है और यही कारण है कि दलितों के खिलाफ होने वाले अत्याचार की संख्या कागज पर घटती जाती है।ड्ढr ड्ढr इस राज का खुलासा तब हुआ जब अनुसूचित जाति-ानजाति कल्याण मंत्री जीतनराम मांझी ने गत वर्ष दलितों के खिलाफ दर्ज हुए अत्याचार के मामलों की समीक्षा शुरू की। श्री मांझी ने बताया कि अनुसूचित जाति अथवा जनजाति के किसी व्यक्ित की हत्या होती है तो पुलिस को यह मामला अनुसूचित जाति-ानजाति उत्पीड़न निवारण अधिनियम की धारा 3 (2)(5) के तहत दर्ज करना चाहिए। दलितों को गंभीर रूप से घायल करने और किसी दलित महिला के साथ बलात्कार की घटना होने पर मामला दर्ज करने के लिए अधिनियम में अलग-अलग धाराएं हैं। लेकिन पुलिस कभी इनका उपयोग ही नहीं करती है। पुलिस इस अधिनियम की केवल एक ही धारा का उपयोग करती है और वह भी जब कोई व्यक्ित किसी दलित व्यक्ित को जातिसूचक शब्द से संबोधित करता है। इस तरह के 2मामले राज्य भर में लम्बित हैं। श्री मांझी ने कहा कि राज्य के हर जिले में अनुसूचित जाति-ानजाति थानों के खुल जाने से इस अधिनियम के तहत मामलों को दर्ज करने में तेजी आएगी।

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