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सपा-कांग्रेस गठचाोड़ में नहीं मायावती की काट

समाज के हर तबके को जाति में बांध कर सत्ता की सुविधाएं बांटने की राजनीति तमाम राजनीतिक दलों के समीकरण बिगाड़ सकती है, यह मंडल के दौर में भी नहीं सोचा गया। मायावती ने जिस तर्ज पर बहुान की परिभाषा गढ़ी, सर्वजन को अपने अनुकूल बनाया, उसने राजनीति की परंपरागत सोच को भी झटके में खारिा कर दिया है। यह अचानक नहीं है कि हर राजनीतिक दल के सत्ता समीकरण के केन्द्र में बीएसपी है। दरअसल मायावती ने मंडल के बाद इस राजनीतिक जमीन को परखा कि लालू या मुलायम सरीखे पिछड़े वर्ग के नेता एक खास जाति पर निर्भर अवश्य हैं लेकिन वो अल्पसंख्यक या गरीब तबके को भी जोड़ रहे हैं, मगर जाति के घेरे में इन्हें लाने से बच भी रहे हैं। कांग्रेस-बीजेपी राष्ट्रवाद के आसरे खुद को राष्ट्रीय दल बनाए हुए हैं। वामपंथी वर्गवाद की थ्योरी के आसरे राजनीतिक विकल्प की बात करते हैं। समाजवादी जाति-तोड़ो का नारा लगाने से नहीं चूकते, लेकिन कोई भी दल जातीय आधार को चुनाव के वक्त खारिा करने की स्थिति में नहीं रहता। इसकी बड़ी वजह भारतीय समाज के भीतर की वह प्रतिस्पर्धा है जो जातियों के टकराव से भी सामने आती है और सत्ता की सुविधाओं में बंदरबांट में ज्यादा से ज्यादा पाने की आकांक्षा को पाले रहने से भी उभरती है। दरअसल मायावती जो राजनीतिक प्रयोग कर रही हैं और उससे आहत होकर अपनी जड़ें मजबूती से बनाए रखने के लिए कांग्रेस-सपा चाहे करीब आ रहे हों लेकिन माया प्रयोग पहली बार समाज के उस खुरदुरपन को उभार रहा है जिसे संसदीय राजनीति ढकती रही। मंडल से पहले सत्ता और आर्थिक लाभ का संघर्ष सामाजिक श्रेणी क्रम में पहले से जमीं बड़ी जातियों तक ही सीमित था। ये तबका सवर्ण-संपन्न-प्रशिक्षित था। मंडल ने सत्ता से लाभ लेने की सोच पिछड़ी जातियों में पैदा की। आकांक्षा इस हद तक बढ़ी कि सत्ता में बने रहने के लिए नेतृत्व की होड़ में फंसे नेताओं के लिए जरूरी हो गया कि वो दूसरी जातियों से अधिकाधिक गठाोड़ के जरिए महत्व हासिल करं, लेकिन इस प्रक्रिया ने जनता का भी राजनीतिकरण किया, जिसने नए नेतृत्व की जगह भी बनाई और जरूरत भी महसूस कराई। मायावती का असल राजनीतिक प्रयोग यहीं से शुरू होता है। उसने मंडल के आधार पर जातियों की राजनीति को ऊंची जातियों के घेर में लाकर राजनीतिक सौदेबाजी का एक नया दायरा बनाया। अगर दलित या पिछड़े तबके की पहचान जातिगत आधार पर है तो मझौली और ऊंची जातियों को भी जातिगत समूह में ही बांधकर यह समझाया कि इस आधार पर राजनीति की जाए तो र्हा क्या है। मायावती ने अपने घेर में भी कई प्रयोग किए। बहुान हिताय को भी जातिगत ढांचे में बांधा। बुद्ध ने कर्मकारों-मजदूरों-गरीबों-पीड़ितों को बहुान कहा यानी बहुत से लोगों का हित, लेकिन मायावती ने दलित-पिछड़ी जातियों और धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय को ही बहुान शब्द से जोड़ा। अंबेडकर ने ब्राह्मणवाद शब्द का प्रयोग यह कहते हुए किया कि यह हर वर्ण-ााति में मौजूद है जिसे खत्म करना होगा । मायावती ने मनुवाद शब्द को बनाया, लेकिन उसे परिभाषित करने की जगह इसे सोच-मानसिकता से जोड़ दिया। कांशीराम ने अछूतों को स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के रूप में खड़ा करने के लिए संगठित किया। मायावती ने उन्हें कमजोर ताकत करार देते हुए सत्ता में ज्यादा दखल का फामरूला सर्वजन हिताय के जरिए निकाला। जो प्रयोग सांस्कृतिकरण के नाम पर भाजपा ऊंची जातियों को लेकर करना चाहती थी, उसे नए तरीके से बसपा ने कर दिया। चूंकि राजनीतिक मैदान में जातियों का बड़बोलापन हमेशा से रहा इसलिए समाज ने इसे भोगा भी। मायावती ने इसके लिए कोई अतिरिक्त कार्ड नहीं फेंका बल्कि दलित को संसदीय राजनीति में सौदेबाजी की सबसे बड़ी जाति के तौर पर स्थापित कर हर दूसरी जाति के सामने इसी तरह बनने का सपना जगा दिया यानी संसदीय राजनीति में सत्ता ही सब कुछ है इसमें विपक्ष का कोई मतलब नहीं है - इसे ठसक के साथ मायावती के प्रयोग ने स्थापित किया। मुलायम या कांग्रेस-भाजपा जब भी सत्ता में आते हैं, उन्हें अपने समर्थन वाली जातियों के लिए नई आर्थिक व्यवस्था की जरूरत मुताबिक सुविधाओं की बंदरबांट करनी पड़ती है। रोगार और मुनाफा पहुंचाने वाली स्कीम तक के घेर में जातियां भी फंसती हैं। मसलन पुलिस भर्ती घोटाले में एक ही जाति के लोगों की भरमार थी, वहीं मायावती के सामने इस तरह के लाभ देने का संकट दलितों को लेकर नहीं है, जिससे वह सत्ता में रहते हुए लाभ पहुंचाए और सत्ता हाथ से निकलते ही दलित समाज किसी घोटाले के घेर में आ जाए। दरअसल नई अर्थव्यवस्था से भी दलित समाज को अभी तक विकास के खांचे से अलग रखा है, इसलिए भी मायावती का रास्ता आसान है। माया को रोगार और विकास का खांचा नहीं खींचना बल्कि मानसिक लड़ाई को ही जिलाए रखना है, जिसमें दलित उत्पीड़न का दौर जारी रहे यह भी जरूरी है। एससी-एसटी आयोग के मुताबिक बीते एक साल के मायावती शासन के दौर में उत्तर प्रदेश में दलित उत्पीड़न के मामलों में 25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। जाहिर है कांग्रेस-भाजपा-सपा की राजनीति मझौली और अगड़ी जातियों को उकसाने से बाज आएगी नहीं और बसपा दलित उत्पीड़न को रोकने से ज्यादा इसे उभारने और इस मानसिकता को जिलाए रखने से चूकेगी नहीं क्योंकि दलित के सत्ता में आने का मतलब उत्पीड़न का बढ़ना भी है। मायावती की काट कांग्रेस-सपा गठबंधन से हो, ऐसा सोचना बचकानापन होगा क्योंकि यह सिर्फ मायावती की शैली ही नहीं है जो उन्हें अपने वोटरों से जोड़ती है, बल्कि पूरी एप्रोच ही फर्क किस्म की है। मायावती के पास पूरी की पूरी एक नई तरह की व्यवस्था है, अपने वोटरों से जुड़ने की भी और उनसे संवाद की भी। यही वजह है कि मायावती कर्नाटक की सारी सीटों पर चुनाव का साहस दिखा रही हैं और इस आत्मविश्वास के साथ कि उन्हें दस फीसदी वोट तो मिल ही जाएंगे। राजनैतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि इतने वोट तो वे हासिल भी कर सकती हैं। यह काम कन्नड़ या अंग्रेजी न जानने वाले लालू यादव नहीं कर सकते। और मुलायम सिंह अगर करते भी हैं तो जंग खाए पुराने कन्नड़ नेता बंगारप्पा के भरोसे। मायावती का यही आत्मविश्वास है जिसके चलते भाजपा और कांग्रेस जसी पार्टियां उनसे दहशत खाती हैं और स्थानीय समीकरणों में बचाव के रास्ते तलाशती हैं। कांग्रेस और सपा अगर पास आने की कोशिश कर रहे हैं तो वह असल में ऐसा ही समीकरण गढ़ रहे हैं, लेकिन यह विनिंग कांबीनेशन नहीं है - न उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पिछले आंकड़ों के आधार पर और न देश में उभर रही नई राजनैतिक शैली के हिसाब से ही।ड्ढr लेखक टेलीविजन पत्रकार हैं

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