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दो टूक

एचइसी के दुर्दिन भले ही खत्म हो गये हों, उसके रिटायर्ड कामगारों की दुश्वारियां अब भी कम नहीं हुई हैं। रिटायरमेंट के बाद बकाये के लिए वे दर-दर की ठोकरें खा रहे। जीवन के आखिरी पड़ाव पर हक की लड़ाई लड़नी पड़ रही। बेटे-बेटियों की शादी, सेहत और तमाम दुनियादारी आखिर ग्रेच्युटी, पीएफ और पेंशन से ही तो पूरी होती है। राज्य में और भी कई पब्लिक सेक्टर कंपनियां और कारपोरशन हैं, जिनके रिटायर्ड कर्मचारियों की भी यही दास्तां है। एरियर की आस में जी रहे। कई तो असमय दम तोड़ चुके हैं। यह एक गंभीर मानवीय सवाल है। रिटायर्ड कर्मियों को समय रहते उनका हक मिलना ही चाहिए। कंपनियां इस जिम्मेदारी से भाग नहीं सकतीं। उन्हें जवाबदेह बनाने के लिए सरकारी मशीनरियों को भी चुस्त करना होगा।

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