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कर्चा का मर्ज

किसान र्का माफी का कदम रंग दिखाने लगा है। स्टेट बैंक ने ट्रैक्टर और कृषि उपकरणों पर ऋण रोक दिया है। जाहिर है सिर्फ राजनैतिक लाभ के लिए किए गए अदूरदर्शी आर्थिक फैसले अधिक समय तक टिक नहीं पाते। जब ट्रैक्टर व पूंजीगत उपकरणों पर देश के सबसे बड़े बैंक की गैर-कामकाजी सम्पत्तियां (एनपीए) 17 प्रतिशत के खतरनाक स्तर पर पहुंच गईं तब उसके पास र्का स्थगित करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। बुआई के मौसम से पहले आया यह फैसला खाते-पीते किसानों के लिए बड़ा झटका है, जिसकी कुछ न कुछ गूंज राजनैतिक गलियारों में सुनाई पड़ना अवश्यंभावी है। छोटे और सीमांत किसानों के साठ हाार करोड़ रुपए के र्का माफी का श्रेय बटोर रही सरकार के हाथ इस निर्णय से ठिठक जाएंगे। मूलत: बैंकिंग एक व्यवसाय है, धर्मार्थ कार्य नहीं। सार्वजनिक बैंक भी मुनाफे के मकसद से चलते हैं। वित्त मंत्री द्वारा बजट भाषण में र्का माफी की घोषणा के बाद किसानों ने बैंकों से लिए करो की किश्त चुकाना रोक दिया, जिस कारण संकट उत्पन्न हो गया। मुसीबत से मुक्ित के लिए स्टेट बैंक को कड़ा कदम उठाना पड़ा। वैसे तो कुल कृषि ऋण में ट्रैक्टर तथा उपकरणों पर दिए जाने वाला र्का का हिस्सा कोई बहुत बड़ा नहीं है, किंतु अन्य बैंकों ने भी यदि स्टेट बैंक के नक्शेकदम पर चलने का फैसला कर लिया, तब विरोधी दलों को मनमोहन सरकार के खिलाफ हवा बनाने का एक मुद्दा मिल जाएगा। चुनावों के मौसम में कोई सरकार किसान विरोधी कहलाए जाने का खतरा नहीं उठा सकती। किसानों के नजरिए से देखा जाए तो वे र्का माफी, मुफ्त बिजली और पानी के बजाय बेहतर सिंचाई व्यवस्था, गांवों में मूलभूत सुविधाओं, कृषि क्षेत्र में अनुसंधान व फसल के मुनासिब दाम के कहीं अधिक हिमायती हैं। वे आत्मसम्मान से जीना चाहते हैं। र्का माफी जसे उपायों से न तो खेती का कल्याण होगा और न ही किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या की घटनाओं में कमी आएगी। ऋण के लिए आज भी अधिकांश किसान साहूकारों पर ही निर्भर हैं और सरकारी र्का माफी में साहूकारों के ऋण से मुक्ित का कोई उपाय नहीं है। फिलहाल बात ट्रैक्टर पर र्का न देने से जुड़ी है। सार्वजनिक बैंकों पर अनावश्यक दबाव बनाने के बजाए सरकार को अपनी नीति को दुरुस्त करना चाहिए। ऐसा करने से ही किसानों और बैंकों का कल्याण संभव है।ं

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  • Web Title: कर्चा का मर्ज