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पटाक्षेप

आधुनिक भारतीय रंगमंच पर जिन लोगों का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा है, विजय तेंदुलकर उनमें से एक थे। विजय तेंदुलकर ने परंपरागत यथार्थवादी नाटक के ढांचे में ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की लेकिन जिस रूखे, तल्ख यथार्थ को उन्होंने अपना विषय बनाया, उसने उन्हें लगातार विवादास्पद बनाए रखा। वे कभी परंपरावादियों के, कभी किन्हीं जातियों के, कभी शिवसेना जसे राजनैतिक संगठनों के निशाने पर रहे, लेकिन बिना कोई राजनैतिक मुद्रा अख्तियार किए वे अविचलित रहे। निजी और सार्वजनिक रिश्तों और संगठनों में व्याप्त तरह-तरह की हिंसा की उन्होंने बहुत तीखी विवेचना अपनी रचनाओं में की और इस तरह भारतीय रंगमंच को मध्यमवर्गीय सुरक्षा के दायर से बाहर निकाला। अभी भारतीय रंगमंच की जो स्थिति है, उसमें यह कल्पना करना कठिन है कि आज से चालीस पैंतालिस साल पहले ‘सखाराम बाइंडर’ या ‘घासीराम कोतवाल’ या ‘शांतता, कोर्ट चालू आहे’ जसे नाटकों ने कैसे विवाद खड़े किए थे। भारतीय रंगमंच को तेंदुलकर को पचाने में लगभग दो दशक लगे । उसके बाद वे सारी भारतीय भाषाओं में अनुदित होने वाले और लगातार खेले जाने वाले नाटककार हुए। इसमें बड़ा योगदान नाटक के शिल्प और मुहावर पर तेंदुलकर की पकड़ का भी था कि नौसीखिया निदेशक भी उनके नाटक ठीक-ठाक खेल जाते थे। दरअसल तेंदुलकर महाराष्ट्र की उस प्रखर बौद्धिक परंपरा के उत्तराधिकारी थे जिसमें हर प्रस्थापना पर प्रश्नचिह्न् लगाना अनिवार्य माना जाता था। तेंदुलकर के विषय विवादास्पद थे लेकिन उनका मुहावरा सरल था इसलिए वे कई चर्चित फिल्मों के पटकथा लेखक की तरह भी सफल हुए। कहा जाता है कि ‘आक्रोश’ की पटकथा से प्रभावित होकर राज कपूर ने अपनी निर्माणाधीन फिल्म की पटकथा के बार में उनसे सलाह की थी। लेकिन फिर भी वे रांक माध्यमों के कलाकार नहीं थे। वे एक कुशाग्र बौद्धिक थे जो हमेशा अपने वक्त के सवालों से जूझते रहे। भारतीय रंगमंच पर वे हमेशा याद किए जाएंगे।

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  • Web Title: पटाक्षेप