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घर वापसी

तमाम भारतवासियों के लिए यह खुशी और राहत की खबर है कि जिन 46 भारतीय नर्सों को इराक के विद्रोही आतंकवादी संगठन आईएसआईएस ने अगवा कर लिया था, वे भारत पहुंच जाएंगी। भारत के 39 नागरिक अब भी आईएसआईएस के कब्जे में हैं और उनकी रिहाई की फिलहाल कोई सूरत नहीं दिख रही है। इन 39 भवन निर्माण मजदूरों को आईएसआईएस ने काफी पहले अगवा कर लिया था। सरकार इनकी भी रिहाई की भरसक कोशिश कर रही है, नर्सो को सौभाग्य से ज्यादा वक्त तक आतंकवादियों के कब्जे में नहीं रहना पडम। ये नर्से केरल की हैं और सभी गरीब परिवारों से हैं। ज्यादातर ने नर्सिंग की अपनी पढाई के लिए कर्ज लिया था या इराक जाने के लिए उन्हें कर्ज लेना पडा है। परिवार की जिम्मेदारी उठाने और इन कर्जों के भुगतान के लिए इन्हें इराक में नौकरी करनी पड रही थी और स्थिति बिगडने के बावजूद आर्थिक वजहों से वे वापस नहीं आ पाईं। अब भी इराक में कुछ भारतीय नर्से हैं और कुछ के बारे में तो यह भी खबर आई कि वे भारत छुट्टी पर आई थीं और इराक में स्थिति बिगडने के बावजूद पिछले कुछ दिनों में इराक वापस गई हैं। यह सब तब है, जब भारत के अस्पतालों में नर्सों की भारी कमी है। भारत में नर्सों को इतनी कम तनख्वाह मिलती है कि कई नर्सें इराक या इसके जैसे खतरों से भरे स्थानों पर जाकर नौकरी करने का फैसला करती हैं। देश में ज्यादातर नर्सिंग प्रशिक्षण संस्थान निजी हैं और उनकी फीस भी अच्छी-खासी है। जो नर्से ज्यादा फीस चुकाकर बेहतर संस्थानों में प्रशिक्षण लेती हैं, वे अमेरिका या यूरोप चली जाती हैं, जिनकी हैसियत उतनी अच्छी नहीं होती, वे खाडी देशों में जाती हैं।

लोग बेहतर नौकरी और तनख्वाहों के लिए विदेश जाते हैं और वहां से जो धन भारत भेजते हैं, वह भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है। केरल की तो अर्थव्यवस्था बहुत हद तक ऐसे ही आप्रवासी भारतीयों पर टिकी है, क्योंकि केरल में शिक्षा तो बहुत है, लेकिन उद्योग और रोजगार नहीं हैं। जो मजदूर इराक में फंसे हैं, उनमें से बहुत से पंजाब के नौजवान हैं। पंजाब में हरित क्रांति से समृद्धि तो आई, लेकिन खेती में रोजगार की सीमा है। पंजाब में भी उद्योगों की स्थिति बहुत खराब है, इसलिए रोजगार कम हैं और पंजाबी नौजवान किसी तरह विदेश जाने की कोशिश में रहते हैं। भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था वाले देश में रोजगार इतने कम हैं कि हमारे नौजवान दुनिया की सबसे खतरनाक जगहों पर जाकर भी नौकरी करने के लिए तैयार रहते हैं। यह खुशकिस्मती कहनी चाहिए कि भारतीय नर्सो के साथ आतंकवादियों ने कोई र्दुव्यवहार नहीं किया और जल्दी ही उन्हें रिहा कर दिया, वरना यह बडम संकट बन सकता था। शायद आईएसआईएस 46 नौजवान महिलाओं को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी और इसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया से बचना चाहता था।

जो भारतीय पुरुष मजदूर आईएसआईएस के कब्जे में हैं, वे इतने खुशकिस्मत नहीं हैं। हो सकता है कि आतंकवादी यह चाहते हों कि अगर उन पर हमला हो, तो ये मजदूर उनके लिए मानव ढाल की तरह काम आएं, या फिर वे अपने साथियों को छुडमने के लिए उनका इस्तेमाल कर सकते हैं। भारत को आईएसआईएस अपना दुश्मन देश मानता है और उसने भारतीय मुसलमानों को अपनी सरकार के खिलाफ बगावत करने को कहा है, मगर खाडी देशों में भारत के कई मित्र हैं और भारत सरकार उनके संपर्को के जरिये अपने मजदूरों को छुडाने की कोशिश कर रही है। यह सारा प्रसंग हमें फिर से याद दिलाता है कि हमारे देशवासी किन-किन परिस्थितियों में विदेश में काम कर रहे हैं।

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