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हैलो डियर मानसून, मदर इल, कम सून

अब हुजूर नई सरकार का ऊंट किसी करवट तो बैठे, ताकि उसके मुंह में जीरा डाला जा सके। मगर वह तो बस बहुमत की जुगाली करने में मगन है। महंगाई की मक्खी को तो ऊंट अपनी गरदन झटककर उडमता है। लेट मानसून का वेट तो करना ही पडता है। सबको पता है कि इन बारिशों  में घर डूबा, तो उन्हीं का डूबेगा, जिनका पिछले साल डूबा था। यही परंपरा है।

मेरे एक मित्र हैं। पाकिस्तान से आए हैं। कम्युनिस्ट हैं, सो रोजा नहीं रखते, मगर भीषण देशप्रेमी हैं। मैंने कहा- हमारे इंडिया में इतनी आजादी है कि कोई भी आदमी संसद भवन के आगे खडे होकर किसी को भी गाली दे सकता है। तुम्हारे पाकिस्तान में क्या है? वह बोले- वहां भी आजादी है। मैंने पूछा कैसे? वह बोले- वहां भी कोई भी आदमी संसद भवन के आगे खडे होकर इंडिया को गाली दे सकता है।

मैं चुप तो हो गया, मगर हारने को तैयार नहीं था। मैंने उन्हें बताया कि मियां, हमारे मोदी साहब बेहद अनुशासन प्रिय हैं। किसी भी अधिकारी या कर्मचारी का देर से आना उन्हें बेहद नापसंद है। मित्र बोले- तो उन्हें चाहिए कि तमाम सरकारी दफ्तरों के आगे वह यह सूचना तख्ती पर लटकवा दें। मैंने पूछा- कौन सी। वह बोले- यही कि देरी से दुर्घटना भली। मुझे नहीं पता, मैं हारा या जीता, मगर दोनों देशों के संबंध प्रगाढ होते लगे। मित्र ने आश्वासन भी दिया कि- मैं चोरी से चला भी गया, तो हेराफेरी से न जाऊंगा। कम से कम इस पर पूरा भरोसा रखो।

मैं मानता हूं कि मेरे लिखे में बिखराव आ रहा है, मगर यह समझ में नहीं आ रहा कि पेट्रोल पियूं या डीजल? आलू-प्याज समेटूं या रेल भाडम चुकाऊं। अब तो बादल आते होंगे। भर-भर गागर लाते होंगे। सावन की तो भली चलाई। अच्छे दिन आने वाले हैं। भागो बच्चों आफत आई। जिसे यह पता न हो कि घुंघरू पांव में बांधे जाते हैं या घुटने में, वह वाजिद अली शाह किस काम का? लडम्कपन की गृहस्थी में क्या नहीं होता?  मानसूनी बादलों के पीछे-पीछे बरसाती बजट भी आ रहा है। जिया दरका है। द्रोपदी स्वयंवर होगा या सीता का चीरहरण, यह तो तब पता चलेगा, जब जटायू मरेगा।

 

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