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शुक्रिया तो अदा करो

अपनी टीम से मिलकर आए, तो वह एक भारीपन महसूस कर रहे थे। कुछ दिन से वह ऑफिस में नहीं थे, और उनकी टीम ने अच्छा काम किया था। लेकिन अपनी टीम की तारीफ में उनसे एक शब्द भी नहीं कहा गया।

‘कभी-कभी जब हम एहसानमंद नहीं होते, तो भी एक दबाव से गुजरते हैं। शुक्रिया अदा करना हमें तनाव से दूर रखता है।’ यह मानना है डॉ. ऐमा सेपाला का। वह स्टैंफोर्ड यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर कंपैशन ऐंड ऑल्ट्रइज्म रिसर्च ऐंड एजुकेशन की एसोशिएट डायरेक्टर हैं। जल्द ही उनकी किताब आने वाली है, ग्रैटीट्यूड: ए साइंस बैक्ड सीक्रेट टू बीइंग हैप्पी, हेल्दी ऐंड सेक्सी ऐंड इन्सपायिरग।

असल में हमें सबसे पहले जो है, उसे मान लेना चाहिए। हम जब उसे नहीं मानते, तो अपने लिए ही दिक्कतें पैदा करते हैं। इसीलिए जब हमें जो करना होता है, बस वही नहीं करते। हमें किसी को उसके काम के लिए बधाई देनी चाहिए। लेकिन हम ठीक वक्त पर ही चूक जाएंगे। हमारे लिए किसी ने कुछ किया है, तो हमें उसके लिए एहसानमंद होना चाहिए। लेकिन हम शुक्रिया अदा नहीं करेंगे। हमने कोई गलती की है। हमें उसके लिए माफी मांगनी चाहिए। लेकिन हम नहीं मांगेंगे।

अब चाहे बधाई देनी हो या शुक्रिया अदा करना हो या माफी मांगनी हो, हम कहीं अटक जाते हैं। और उस अटकाव के साथ ही एक बोझ अपने ऊपर लाद लेते हैं। यही बोझ हम पर दबाव बनाता है। और एक दौर के बाद तनाव में डाल देता है। ठीक यहीं से चीजें गडम्बडमने लगती हैं। हम सहज नहीं रह जाते। यह सहज रहना हमारे लिए बेहद जरूरी होता है। हम जितना ही सहज होते हैं, उतना ही खुद को खुला हुआ महसूस करते हैं। जरा-सा असहज होते ही जकडम्न का एहसास होता है। इसी जकडम्न से हमें बचना चाहिए। यह हमारे रास्ते की अडम्चन है। तो क्या तय किया?

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