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हर एक रिश्ता जरूरी है

मैं बेंगलुरु में था। वहां के उस सबसे पॉश अपार्टमेंट में रहने वाले एक अकेले बुजुर्ग की मौत हो गई थी, और पूरे मुहल्ले को उनकी मौत के बारे में कोई हफ्ते भर बाद पता चला। उन बुजुर्ग सज्जन का एक बेटा अमेरिका के किसी शहर में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता है, दूसरा बेटा भी किसी दूसरे देश में रहता है। पिता अकेले बेंगलुरु में रहते थे, अडोसी-पडोसी से ज्यादा रिश्ता नहीं था। एक दिन अकेले घर में सोए, तो सोए ही रह गए। मुझे नहीं पता कि अपने दो बच्चों के साथ उन्होंने अपना जीवन किस तरह गुजारा, पर इतना सोच पा रहा था कि शायद अपनी ही संतान के साथ उनके रिश्तों को चिपकाए रखने वाला वह तरल तत्व सूख चुका था, जिसका होना ‘जीव द्रव्य’ की तरह होता है। हमें समय-समय पर जांचते रहना चाहिए कि किन-किन रिश्तों के लिए दिल अब भी धडकता है। किन रिश्तों से वह जीव द्रव्य सूख चला है। अगर समय रहते रिश्तों के उस गीलेपन को हवा-पानी नहीं दिया गया, तो यकीन कीजिए, एक नहीं कई-कई फ्लैट के मालिक तो आप बन जाएंगे, लेकिन अपना बुढमपा, अपनी बीमारी और अपने अकेलेपन को दूर करने वाला एक भी यंत्र आपके पास नहीं होगा। मकान और बैंक बैलेंस सिर्फ एक एहसास भर रह जाएंगे कि एक दिन आपके बुढापे में ये सब काम आएंगे, सच तो यह है कि कुछ भी काम नहीं आएगा। जब आपके क्रोमोजोम से निकली आपकी ही संतान आपके बदन की खुशबू को नहीं मससूस कर पाएगी, तो फिर मुहल्ले वालों को क्या पडी है?

आज तक में संजय सिन्हा

 

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