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मुशर्रफ के साथी

हालिया घटनाओं की सुर्खियों तले दब चुके मुशर्रफ के मुकदमे में सियासी रुख क्या है, यह जानना वाकई मुश्किल है। हुकूमत इस मुकदमे को आगे ले भी जाना चाहती या फिर वह सिविल-मिल्रिटी रिश्ते के (कु)तर्क के आगे घुटने टेकते हुए मुशर्रफ को पाकिस्तान से बाहर निकलने की इजाजत दे देगी? इन दिनों पूर्व तानाशाह के खरख्वाह इस उम्मीद में पूरी ताकत से ऐसी खबरें व सुर्खियां बटोरने में जुटे हैं, जिनके जरिये मौजूदा हुकूमत को दबाव में लिया जा सके। इन दिनों वे उस ‘लिस्ट’ का हौवा खडम कर रहे हैं, जिसमें कथित तौर पर उन फौजी अफसरों व रसूखदार लोगों के नाम दर्ज हैं, जिन्होंने मुल्क में इमरजेंसी लगाने के लिए मुशर्रफ को ‘उकसाया’ था। बहरहाल, इस मामले में दो पहलुओं पर गौर करने की जरूरत है। एक, लोगों ने उकसाया हो या नहीं, यह बात मुशर्रफ के मुकदमे में बहुत मायने नहीं रखती। आखिरकार, इमरजेंसी के ऑर्डर पर दस्तख्त तो परवेज मुशर्रफ ने किए थे। वह एक गैर-कानूनी कदम था और इसकी अवैधानिकता इस दलील से कतई कम नहीं हो जाती कि उन्होंने वह दस्तख्त किसी के कहने पर किया था।

दरअसल, मुर्शफ के बचाव में जुटी टीम का इरादा यही है कि इस मुकदमे में उस वक्त के दूसरे बडे फौजी अफसरों के नाम भी घसीट लिए जाएं। उनकी इस सोच के पीछे यह उम्मीद बसी है कि इन फौजी अफसरों के नाम आने के बाद हुकूमत दबाव में आ जाएगी और वह इस मुकदमे को ज्यादा तूल नहीं दे पाएगी। दूसरा पहलू यह है कि मुशर्रफ के बचाव में जुटी टीम के जगजाहिर मकसद को एक तरफ रख दें, तब भी यह मुकदमा उन लोगों तक तो पहुंचता ही है, जिन्होंने जनरल मुशर्रफ के साथ तब गठजोड किया था। यह एक कडवी और खुली सच्चाई है कि मुशर्रफ की वह तानाशाही इसलिए वजूद में आ पाई, क्योंकि मुल्क के कई आला नेता, जज, नौकरशाह और सरकारी ओहदेदार उस निजाम के हमराह हुए थे। इसलिए पाकिस्तान में अगर तानाशाही के पाठ को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म करना है, तो उन सभी लोगों की भी जिम्मेदारी तय करनी पडेगी, जिन्होंने उस वक्त परवेज मुशर्रफ का साथ दिया था।  

द डॉन, पाकिस्तान

 

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