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भाषा का मसला

भाषा का मसला
पिछले दिनों वरिष्ठ तमिल पत्रकार एस. श्रीनिवासन का एक लेख ‘भाषा का मसला लोगों पर छोडना बेहतर’ पढा। अच्छा लगा। सचमुच यदि भाषा का मसला लोगों पर छोड दिया जाए, तो यह स्वत: हल हो जाएगा। इसमें समय जरूर लग सकता है। नेहरूजी का यह विचार वैसे तो उत्तम था कि देश को यदि भाषायी आधार पर राज्यों में विभाजित किया जाता, तो अधिक पीडादायी होता। हमारे एक तमिल साथी हैं। बडी अच्छी हिंदी बोलते हैं। एक दिन मैंने जिज्ञासावश उनसे पूछा कि तमिलनाडु में हिंदी का इतना विरोध क्यों होता है, जबकि आप तो बडी अच्छी हिंदी बोलते हैं। उनका जवाब था- दोस्त, सब राजनीति है। वहां बहुत लोग ऐसे हैं, जो हिंदी का ज्ञान रखते हैं। मेरी एक बुआ थीं, जो अब जीवित नहीं हैं, लेकिन उनका परिवार आज भी हैदराबाद में ही रहता है। बुआ दशकों पहले हैदराबाद में  बस गई थीं। वह तेलुगू इतनी धाराप्रवाह बोलती थीं कि हम सब उनका मुंह ही देखते रह जाते थे। शौक-शौक में हम भी नक्को-नक्को बोलना सीख गए थे और वाकई यह शब्द बोलकर हम आनंद का अनुभव करते थे। भाषा एक ऐसी चीज है, जिसे सीखने के लिए किसी दबाव की जरूरत नहीं है, मनुष्य अपनी इच्छा से इसे सीख लेता है।
इंद्र सिंह धिगान, रेडियो कॉलोनी, किंग्जवे कैम्प, दिल्ली

मर्मभेदी दास्तां
‘जीने की राह’ कॉलम के तहत सुनीता मुर्मू की दास्तां पढी। पढकर लगा कि ‘बेशक देश 21वीं सदी में पहुंच गया है, मगर मेरे इस महान देश के कुछ लोग इंसान बनने की बजाय अब भी जानवर बनने की कोशिश कर रहे हैं। वे स्त्री को सबके सामने निर्वस्त्र करके आनंद का अनुभव करते हैं। जो भी हो, अब काम कानून और न्याय (दंड) को करना है और ऐसे वहशी दरिंदों या जानवरों को ऐसा दंड देना है, ताकि भविष्य में फिर कोई पंचायत किसी सुनीता मुर्मू की तरफ आंख उठाकर न देख सके।
ताराचंद ‘देव’ रैगर, श्रीनिवासपुरी, दिल्ली

पासधारकों की पीडा
दिल्ली परिवहन निगम यानी डीटीसी की बसों में सफर के लिए पास बनाने में बडी कुव्यवस्था है। वैसे तो पास बनाने के लिए जगह-जगह ऑफिस हैं और उनमें कंप्यूटर भी हैं, मगर ज्यादातर पास सेंटरों के कंप्यूटर कई-कई दिनों तक खराब रहते हैं। मुसीबत यह है कि एक बार पास जहां से बना, तो उसका नवीनीकरण भी केवल वहीं से हो सकता है। अब ऐसे में कंप्यूटर खराब होने के कारण इन दफ्तरों के कई-कई दिन चक्कर लगाने पडते हैं। जाहिर-सी बात है कि इससे समय की बरबादी होने के साथ-साथ पैसे भी अनावश्यक खर्च होते हैं। सच्चाई यह है कि डीटीसी आज के दिन करोडों की राशि दैनिक टिकटों व पास की बिक्री से अर्जित करती है, तो फिर पासधारकों की सुविधा के लिए वह रेलवे की तरह यह काम ऑनलाइन क्यों नहीं कर देती? लोगों को भी सुविधा होगी, और उसके काम का बोझ भी कुछ कम होगा।
राजेंद्र सिंह रावत, मध्य प्रदेश भवन, नई दिल्ली

आखिर नुकसान किसका
जब भी कोई दुर्घटना होती है, तो प्राय: लोगों का गुस्सा बसों, ट्रकों या रेलगाडियों को जलाने या उन्हें नुकसान पहुंचाने के रूप में सामने आता है या फिर ट्रैफिक जाम करके लोगों की गतिविधियों को ठप कर दिया जाता है। कई बार तो यह सब पुलिस के सामने होता रहता है और पुलिस मूकदर्शक बनी देखती रहती है। माना कि यह जनता के आक्रोश के कारण होता है, लेकिन ऐसा भी क्या, जो देश की करोडों रुपये की संपत्ति नष्ट कर दी जाए। क्या इससे समस्या का हल निकल आता है? आक्रोश के अलावा इसके पीछे एक कारण जनता का पुलिस और प्रशासन पर अविश्वास भी है। लोग यह समझते हैं कि जब तक उग्र प्रदर्शन नहीं किया जाएगा, शासन के कानों पर जूं भी नहीं रेंगेगी। लेकिन सोचना चाहिए कि आखिर यह नुकसान किसका है? देश का, स्वयं हमारा है। इस समस्या के निदान के बारे में सबको गंभीरता से सोचना चाहिए।
अरुण मित्र, रामनगर, दिल्ली-51

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