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पारदर्शिता ही है ऐसे विवादों का जवाब

देश के प्रधान न्यायाधीश का यह कहना कि कार्यपालिका ने न्यायपालिका की सिफारिशों के प्रति लापरवाही  बरती है, और उसके चलते न्यायिक व्यवस्था की स्वायत्तता से समझौता हुआ है, दरअसल कार्यपालिका पर न्यायपालिका की एक प्रतीकात्मक जीत है। प्रधान न्यायाधीश ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि इस तरह का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। फिर भी यह जीत प्रतीकात्मक ही है, क्योंकि सरकार मानती है कि उसने कुछ भी गलत नहीं किया। सरकार की तरफ से यहां तक कहा जा रहा है कि गोपाल सुब्रमण्यम का नाम कॉलेजियम को पुनर्विचार के लिए भेजने से पहले ही उन्होंने अपनी सहमति वापस ले ली। ऐसे में, प्रेस को दिए जाने वाले रूटीन सरकारी बयान से अधिक संपूर्ण खुलासे की आवश्यकता है कि अक्षरश: क्या-क्या हुआ और कब-कब हुआ? कब सुब्रमण्यम के नाम की सिफारिश को वापस भेजने का निर्णय लिया गया? कब पुनर्विचार के कारणों के साथ प्रधान न्यायाधीश को यह सूचित किया गया? कब नाम अलग किए गए और तीन नाम राष्ट्रपति के पास भेजे गए और चौथा नहीं भेजा गया? यदि किसी भी तरह से चौथा नाम कॉलेजियम को वापस भेजा गया, तो कब भेजा गया? कब राष्ट्रपति को पायोनियर अखबार से जुड़े एक पत्रकार की शिकायतें मिलीं? इस पर उन्होंने क्या किया? प्रेस रिपोर्ट से तो यही लगता है कि चुनाव के नतीजे के बाद आपत्तियां भेजी गईं और राष्ट्रपति ने सुब्रमण्यम से जुड़ी फाइल मांगने या न्यायपालिका तक उन आपत्तियों को भेजने की बजाय उसे सरकार के पास भेज दिया।

मालूम होता है कि तब सरकार ने इस शिकायत पर सीबीआई से रिपोर्ट मांगी और आईबी को भी रिपोर्ट देने को कहा। यह सब 15 मई, 2014 को आईबी द्वारा प्रारंभिक मंजूरी के बाद किया गया। इसलिए यह आवश्यक है कि उस तथाकथित ‘नाम हटाने की प्रक्रिया’ के पूरे ब्योरे को अलग-अलग किया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वास्तव में हुआ क्या था। यह देखते हुए कि न्यायपालिका ने सर्वोच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति के लिए चार नाम भेजे थे और यह भी देखते हुए कि अब हम जानते हैं कि ‘नाम हटाने’ का काम प्रधान न्यायाधीश की जानकारी के बिना हुआ, तो इससे यह स्पष्ट होता है कि कार्यपालिका ने कुछ बिंदुओं पर तीन नामों को मंजूरी दी और यह फैसला लिया कि प्रधान न्यायाधीश को इसकी जानकारी दिए बिना या न्यायपालिका से इस पर पुनर्विचार कराए बिना, नियुक्ति के लिए गोपाल सुब्रमण्यम के नाम को मंजूरी नहीं देना है। इसलिए जिसे ‘नाम काटना’ कहा जा रहा है, वह वास्तव में चौथे नाम पर वीटो है। फाइल रोककर इस नियुक्ति को खत्म कर दिया गया।

इस दौरान, कार्यपालिका द्वारा सीबीआई रिपोर्ट और आईबी रिपोर्ट की स्थिति के बारे में कुछ रहस्योद्घाटन किए गए। जनता को यह विश्वास दिलाने की कोशिश हुई कि उनके नाम पर पुनर्विचार का सही कारण था, इसलिए तथ्यों को सार्वजनिक किया गया। लेकिन यह सब प्रधान न्यायाधीश को जानकारी दिए बिना हुआ। इस पूरी घटना के समय को देखते हुए कोई भी यही सोचेगा कि सुब्रमण्यम की नियुक्ति की सिफारिश को रद्द करने के फैसले के बाद उनके खिलाफ रिपोर्ट तैयार कराई गई। जो तरीका अपनाया गया और जिस समय में यह पूरी घटना घटी, ये दोनों इस बात को पुख्ता करते हैं कि पहले गोपाल सुब्रमण्यम को नियुक्त नहीं करने का फैसला किया गया और उसके बाद रिकॉर्ड के लिए कारण ढूंढ़े गए। जो कारण दिखता है, वह यह है कि 2011 में सुब्रमण्यम की मुलाकात सीबीआई के प्रतिनिधियों और मामले की सुनवाई के दौरान ए राजा के वकील से हुई थी।

ये आरोप सार्वजनिक मंचों पर पहले से हैं और उनके नाम की सिफारिश करते समय कॉलेजियम को इसकी जानकारी रही होगी। रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जो कॉलेजियम की संस्तुति के बाद आया हो। गोपाल सुब्रमण्यम को अयोग्य करने के सरकारी उद्देश्य को समझने की कोशिश में हमें यह भी याद रखना चाहिए कि अरुण जेटली ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि सोहराबुद्दीन मामले में गोपाल सुब्रमण्यम ने अपनी हदें लांघीं। तब अमित शाह को बिना शर्त जमानत के विरोध में सुब्रमण्यम ने अपना तर्क रखा था। हालांकि, यह अलग बात है कि जजों ने उनकी पेशेवर शैली की सराहना की थी। ऐसे में, कोई भी इसी नतीजे पर पहुंच सकता है कि सोहराबुद्दीन मामले में उनकी मौजूदगी के कारण वीटो लगा, न कि रिकॉर्ड में जो कारण गिनाए गए हैं, उनकी वजह से। हमें देश के प्रधान न्यायाधीश द्वारा बताया जाता है कि उन्हें इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी नहीं थी और उन्होंने विदेश से अपने लौटने तक सुब्रमण्यम को इंतजार करने को कहा था।

शायद सुब्रमण्यम जानते थे कि प्रधान न्यायाधीश को क्या मालूम नहीं है, उन प्रयासों के बारे में, जो उनके अयोग्य ठहराने के लिए किए जा रहे थे। और उन्होंने अपनी सहमति वापस ले ली। इस आधार पर उन्हें जिम्मेदार ठहराया नहीं जा सकता कि यह निर्णय उनका है। अपना नाम वापस लेकर उन्होंने देश में कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच एक बड़े टकराव को रोकने में शायद मदद ही की, लेकिन इससे कार्यपालिका और न्यायपालिका, दोनों जनता के सामने पूरी सच्चई पेश करने से बच नहीं जाती हैं। इसमें ध्यान देने लायक यह है कि न्यायपालिका ने कुछ हद तक अपनी दृढ़ता दिखाई है। तीन चुने हुए नामों को अब तक शपथ नहीं दिलाई गई है। नाम पर सहमति देना राष्ट्रपति के अधिकार के दायरे में है, तो शपथ-ग्रहण कराना प्रधान न्यायाधीश के अधिकार-क्षेत्र में।

समस्या का मूल कारण है न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में बरती जाने वाली गोपनीयता, जो किसी व्यक्ति विशेष की नियुक्ति न होने की तुलना में तंत्र को अधिक नुकसान पहुंचाती है। मुद्दा यह नहीं है कि सुब्रमण्यम को कार्यपालिका द्वारा योग्य माना गया या नहीं, बल्कि असली मुद्दा कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति-संतुलन का है। न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा ने कहा है कि वह न्यायपालिका की स्वायत्तता से समझौते की इजाजत देने की बजाय पद छोड़ना चाहेंगे। लेकिन हम सब जानते हैं कि लीक और गोपनीयता के जरिये यह काम हो रहा है। इसलिए उन्हें मिसाल पेश करनी चाहिए, जैसा कि उन्होंने मंगलवार को किया। सुब्रमण्यम की नियुक्ति-सिफारिश से जुड़ी तमाम फाइलें सार्वजनिक की जानी चाहिए। हमेशा की तरह, इस बार भी तफसील में ही करतूतें छिपी हैं और इस मामले में तारीखें पूरी कहानी बयां कर देंगी। हम भारत के लोगों को यह जरूर मांग करनी चाहिए कि नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और सार्वजनिक हो, ताकि हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के जजों की नियुक्ति में हर किसी के लिए समान अवसर आए। यह प्रकरण न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रणाली में कई त्रुटियों को उजागर करता है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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