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खरी-खरी के बाद

उनकी खरी-खरी सुनने के बाद मन कसैला हो गया। बहुत दिनों से जिस प्रोजेक्ट रिपोर्ट पर काम किया जा रहा था, उसे बकवास बता दिया गया। ऐसा हमारे साथ अक्सर होता है। ऐसे में, हमसे गलती यह होती है कि हम अपना मनचाहा नहीं होने पर ऐसी प्रतिक्रिया दे बैठते हैं, जो हमारे ही खिलाफ चली जाती है। टीटी रंगराजन एक गहरे अध्यात्मवादी रहे हैं। उन्होंने एक खूबसूरत किताब लिखी- अनपोस्टेड लेटर। इसमें वह कहते हैं कि यदि कोई आपकी ओर चाकू फेंके, तो आपकी समझदारी इसी में है कि आप उसे हत्थे की ओर से पकड़ें। विपरीत ओर से पकड़ने पर आपके हाथ में चोट आ सकती है। अपनी आलोचना पर भी ऐसा ही किया जा सकता है। फायदे वाली बातें रख ली जानी चाहिए और बाकी को कूड़े में फेंक देना चाहिए। हम कह सकते हैं कि किसी की बात पर ध्यान क्यों दें? लेकिन याद रखें, अपनी आलोचना को एक सिरे से खारिज करने की प्रवृत्ति से हमें बचना चाहिए।

बुरे-से-बुरे आलोचक की भी कुछ बातें खरे सोने की तरह होती हैं। हमें उसका सम्मान करना चाहिए और खुद को निरंतर सुधार की एक प्रक्रिया में झोंके रखना चाहिए। रंगराजन कहते हैं कि ज्यादातर मामलों में समस्या व्यक्ति और उसकी भूमिका में समन्वय नहीं होने की है। भूमिका बढ़ती जाती है और व्यक्ति का आकार जस का तस रह जाता है। इसके लिए जरूरी है कि लगातार खुद को ‘अप टू मार्क’ करें। जैसी बॉल आए, वैसी बैटिंग करें। जब भी आपकी आलोचना हो, तो यह देख लें कि यह साधार और सप्रमाण है या नहीं। विंस्टन चर्चिल इस मामले में आदर्श थे। वे रोजाना अखबार देखते। अपने खिलाफ आई खबरों की कटिंग करते। उसे बार-बार पढ़ते। अगर उसमें कोई आधार दिखता, तो फिर सुधार में जुट जाते। सुधार उनके लिए एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया थी। इसलिए सफलता उनकी दासी थी।

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